अखिलेश की सरकार,ईमानदार तड़ीपार

अखिलेश यादव सरकार जल्द ही नौकरशाहों की पदोन्नति करने वाली है, पर हलचल है कि इसबार भी चहेते नौकरशाह ही मलाई काटेंगे.हमारे लखनऊ ब्यूरो प्रमुख अनुराग मिश्र की तहकीकात बताती है कि ईमानदार अधिकारियों को फिर निराशा हाथ लगेगी.

चहेते नौकरशाहों के पालनहार

अभी कुछ दिनों से सूचना आ रही है कि राज्य की अखिलेश सरकार कुछ आईपीएस व आईएएस अधिकारियों को 15 जनवरी के बाद प्रोन्नति देने जा रही हैं.कहा जा रहा है कि ये विभागीय प्रोन्नति है जो एक निश्चित समय पर किसी भी अधिकारी को उसके सवाकाल में मिलती हैं.पर यहाँ एक अहम् प्रश्न कि यदि अधिकारियों को मिलने वाली प्रोनत्ति रूटीन प्रोनत्ति का हिस्सा है तो फिर ये प्रोन्नति कुछ खास अधिकारियों को ही क्यों मिलेगी.

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अगर अधिकारियों की सूची देखें तो तो पता चलेगा कि तमाम ऐसे भी अधिकारी है जो प्रोनन्ति पाने के पात्र है फिर भी उन्हें पिछले कई वर्षो से प्रोनत्ति नहीं मिली.ऐसे अधिकारी उत्तरप्रदेश में कई हैं.
इस कड़ी में एक महत्वपूर्ण नाम आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर का है जो पिछले कई वर्षो से पुलिस अधीक्षक के पद पर ही लटकाये रखे गये हैं. खबर है कि 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर को पदोन्नति नहीं दी जा रही क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने कर्तव्य से समझौता नहीं किया.इतना ही नहीं उन्होंने तो कई बार सच्चाई की हिफाजत में प्रदेश सरकार के खिलाफ भी अपनी आवाज बुलंद की.यही कारण कि चाहे मायावती की सरकार रही या मुलायम की वो हमेशा सरकार की आँखों की किरकिरी बने रहे.

ठीक इसके विपरीत उन्ही के साथ के तमाम आईपीएस अधिकारी आज प्रोन्नति पाकर पुलिस उप-महानिरीक्षक के पद पर पहुच गएँ.

सत्ताधारी पार्टियों की अवहेलना झेलना वाले 1992 बैच के एक अन्य आईपीएस अधिकारी हैं जसबीर सिंह.जसबीर सिंह भी पिछले छह-सात सालों से राज करने वाली पार्टियों को इसलिए नहीं सुहाते कि राजनीतिक नेतृत्व की चापलूसी करने की बजाये ये जनता की हितों को तरजीह देते हैं.

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नापाक गठजोड़

ये तो सिर्फ एक बानगी है सत्ता और ब्यूरोक्रेसी के उस नापाक गठजोड़ की जिसमे भ्रष्ट अधिकारी लगातार प्रोन्नति पता जाते हैं और ईमानदार अपनी ईमानदारी के सिले में नाइंसाफी का शिकार होता रहता है.इतना ही नहीं सजा पाया हुआ भ्रष्ट अधिकारी भी सत्तानाशीनों की मेहरबानी पर महतवपूर्ण पदों पर आसीन हो जाता है जिसमे ताजा नाम वरिष्ठ प्रशानिक अधिकारी राजीव कुमार का है जो अखिलेश सरकार की मेहरबानियों के चलते एक बार पुनः मतवपूर्ण पद, प्रमुख सचिव नियुक्ति के पद पर आसीन हो गए हैं.

जबकि सजायाफ्ता अधिकारी की पदोन्नति में कई रुकावटें होती हैं.इसके बावजूद अखिलेश यादव सरकार ने नियमों को धता बताते हुए सजा पाए हुए अधिकारी को महतवपूर्ण पद पर नियिुक्ति कर दिया है.इसके उलट जो ईमानदार और बेदाग है वो आज भी विभिन्न महत्वहीन पदों पर बैठें है.

हलाकि यह पहली बार नहीं हुआ जब अखिलेश सरकार ने किसी सजा पाए हुए अधिकारी को महत्वपूर्ण पद पर बैठाया हो इससे पहले भी उन्होंने एनआरएचएम घोटाले में सजा पाए हुए वरिष्ठ प्रशानिक अधिकारी प्रदीप कुमार को महतवपूर्ण पद बैठाया था.पर लखनऊ उच्च न्यायालाय की सख्ती के चलते राज्य सरकार को उन्हें उनके पद से हटाना पड़ा था.

हालाकि लखनऊ के जुझारू पत्रकार ने मसले पर अपनी आवाज उठायी.उन्होने राजीव कुमार की नियुक्ति के खिलाफ इलाहाबाद की लखनऊ खण्डपीठ में एक यचिका दखिल की है.ऐसी स्थति यह देखना रोचक होगा की प्रशानिक अधिकारी राजीव कुमार की प्रमुख सचिव नियुक्ति के रूप में हुई तैनाती को चुनौती देने वाली इस याचिका पर उच्च न्यायालाय की लखनऊ खण्डपीठ क्या रुख अपनाती है?

पिछली बार उच्च न्यायालय ने इस सड़ांध को काफी हद तक साफ करने की कोशिश की थी.हो सकता इस बार भी करें. पर यक्ष प्रश्न यही है कि कब तक उच्च न्यायालय सत्ता की गलियारों की सड़ांध साफ करेगा? क्या राजनेताओं से ईमानदारी की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए?

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