अच्छे दिन का सफर

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार पटना से बनारस जिस ट्रेन से चले उसके एक पैसेंजर की ट्रॉली चोरी हो गयी. पुलिस,ट्रॉली  के बजाये उस जगह की खोज मे लग गयी जहां से चोरी हुई. फिर क्या हुआ?train
मैं निकला था विभूति एक्सप्रेस पकड़ने. स्टेशन पहुंचा तो पंजाब मेल के आने की खबर हो रही थी. टिकट कटाया. अभी सुस्ताने के लिए नजर कोई जगह ढूंढ ही रही थी कि पंजाब मेल की लाइट दिखी. मन में आया, चलो, सुबह तीन बजे जगना शुभ रहा. अच्छे दिन की शुरुआत की तरह. पौने चार के आसपास हम स्टेशन पर थे.

26 मई का महत्व
26 मई का दिन बहुत सारे लोगों को बहुत सारी वजहों से याद रह सकता है. पर मेरे लिए बनारस पहुंचना जरूरी था और उसके याद रखने की वजह निजी थी.
हम एस टू में सवार हो गये. पूरा डिब्बा बंगाली परिवारों से भरा था. ज्यादातर लोग जगते हुए भी सो रहे थे. उनके भाव ऐसे थे कि रिजव्रेशन का एक-एक पाई वसूल लेना है. किसी भी सीट पर एक बित्ता जगह नहीं ताकि उसमें कोई अपना आधार एडजस्ट कर सके. बर्थ पर लेटे लोग कनखियों से आने-जाने वाले को देखते. वहां से किसी के सरकने पर शरीर में हलचल होने लगती. किसी के खड़े रहने पर शरीर निढ़ाल. टांगे पूरी तरह पसरी हुई. जब संवाद नहीं तो बैठने का आग्रह कैसे होगा?
लुधियाना जा रहे दो मजदूरों के बीच हमने अपनी जगह बनायी.

आमी ट्रॉली देखबे ना?
आरा स्टेशन पहुंचते तो एक सफेद बालों वाले दादा ने कहा- आमी ट्रॉली देखबे ना? उन्होंने जागती हुई अपनी बीवी को उठाया. ट्राली के बारे में पूछा. महिला ने नीचे झांका. ताला और जंजीर हाथ में आ गया. ट्रॉली गायब थी. ओ रे बाबा.. सब गंडेगोल हो चै. बात पसरते देर न लगी. दादा उदास. उनकी बीवी परेशान. दूसरे परिवारों के लोगों का आना शुरू हो गया. क्या था? कोई कीमती सामान तो नही था? पैसा तो नहीं था.

 

दादा रूआंसे होकर सबको बताते- गर्म कपड़े थे. जम्मू-कश्मीर में पहनने के वास्ते रखे हुए थे. एक एटीएम कार्ड भी था. एटीएम सुनते ही सजेशन आने शुरू हो गये. किसी ने कहा-उसे लॉक कराना जरूरी है. कॉल सेंटर पर फोन करिए. अफरातफरी में फोन लगे ही नहीं. दादा ने कोलकाता फोन किया. अपने किसी परिचित को हादसे की जानकारी दी. गाड़ी बढ़ी तो सहानुभूति भी आने लगी. किसी ने कहा- ज्यादा चिंता करने का जरूरत नहीं. लुधियाना में हमलोग सामान खरीद लेंगे.
उदासी, चिंता के बीच जीआरपी के दो जवानों पर नजर पड़ते ही, दादा चीख पड़े- इहे बेओस्था है आपलोगों का? देखिए तो मेरा ट्रॉली चोरी हो गया? एक जवान बोला- चोरी? आप कैसे कह रहे हैं कि सामान चोरी हो गया? कहां हुआ है चोरी? पटना से गाड़ी खुली तो ट्रॉली गायब थी. दूसरे जवान ने कहा-आप ठीक-ठीक याद कर बताइए कि सामान कहां गयाब हुआ?

दादा बोले- पटना के बाद. पहले जवान ने कहा- हो ही नहीं सकता. पटना में हमलोग चढ़े हैं. सामान की चोरी पटना से पहले हुई होगी. आप याद करिए. सामान पर अंतिम बार कब नजर पड़ी थी. दादा ने बताया- पटना से पहले. दूसरे जवान ने कहा- वही तो हम भी कह रहे हैं कि सामान की चोरी पटना से पहले हुई है. पहले ने कहा- देखिए कंप्लेन लिखाना चाहते हैं तो दे दीजिए. लेकिन ठीक-ठीक लिखिएगा कि सामान गायब कहां हुआ? दादा कंफ्यूूज्ड. उनकी बीवी अलग परेशान? वह कहने लगीं- चितरंजन में दो जन आकर यहां नीचे ही सो गया. बोलने लगा-हम स्टाफ के आदमी है. लगता है, उन्हीं लोगों ने यह सब कर दिया. बात चोरी वाली जगह पर टिकी थी. दूसरे बंगाली परिवारों ने जोड़-घटाव शुरू कर दिया. जीआरपी के दोनों जवान चोरी के खोज स्थान की तलाश कर रहे लोगों को छोड़कर चुपचाप निकल गये. कंप्लेन दर्ज कराने की याद कहां रही किसी को?
समय निकल रहा था. असामान्य हालात कुछ सामान्य होने लगे थे. लोग नाश्ता लेने लगे. गरम चाय भी आ रही थी. बीच-बीच में ट्रॉली की याद आते ही दादा चीख पड़ते- इसको क्या पड़ी थी जे सामान को ट्रॉली में रख दिया. महिला सहम जाती.

अजय कुमार प्रभात खबर पटना से जुड़े हैं

 

 

 
साढ़े नौ बजे हम मुगलसराय स्टेशन पहुंच गये. अब आधा-पौन घंटे का सफर बाकी था.

 

 

 

गाड़ी के टोटे सूख गये थे. हलक सुखाने भर भी मेरी बोलत में पानी नहीं बचा था. इसी बीच छोटे-छोटे बच्चे पानी का करोबार करने पहुंच गये. वे बगल के गांव के थे. पुरानी बोतल में चापाकल का पानी. रेट बीस रोपेया. किसी ने मोल-मोलाई कर दस में लिया तो किसी ने 12 में. बनारस जाने वाले एक लोकल पैसेंजर हवाई अपशब्द की बौछार करने लगते. उन्हें ऑफिस पकड़ना था. डिब्बे में कुछ पंखे चल रहे थे. कई लोग नहीं चलते पंखों को देखकर भुनभुना रहे थे. किसी ने बुलेट ट्रेन का जिक्र कर दिया. कई लोग उस पर टूट पड़े

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