अदालती प्रहार: देनी पड़ सकती है सरकार को नेता प्रतिपक्ष को मंजूरी

सुप्रीमकोर्ट लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष की नियुक्ति के मामले को गंभीरता से ले कर मोदी सरकार को गंभीर चपत लगा दिया है. कोर्ट ने कई तकनीकी पहुलुओं को उठाते हुए सरकार से सवाल पूछा है. पढ़ें क्या है सवालls

शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि विधान को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता. इस पद के महत्व पर जोर देते हुए प्रधान न्यायाधीश आर एल लोढा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि विपक्ष का नेता सदन में सरकार से अलग स्वर का प्रतिनिधित्व करता है.

अदालत के सवाल

शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से इस मामले में दो सप्ताह में अपना रुख स्पष्ट करने को कहा.  सुपप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोकपाल नियुक्ति में  विपक्ष के नेता चयन समिति के सदस्य होते हैं ऐसे में लोकपाल की नियुक्ति सरकार उसके बिना कैसे करेगी?

मालूम हो कि मोदी सरकार कई बार यह स्पष्ट कर चुकी है कि कांग्रेस पार्टी का लोकसभा में सदस्यों की संख्या अपर्याप्त है इसलिए उसे लोकसभा में नेता विपक्ष का पद नहीं दिया जा सकता. कुछ ऐसी ही बातें लोकसभा की स्पीकर ने भी पिछले दिनों कहा.

लोकसभा में 44 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस विपक्ष के नेता पद के लिए कड़ी मशक्कत कर रही है लेकिन सत्तारूढ़ भाजपा उसकी मांग को स्वीकार नहीं करने पर अड़ी है. भाजपा का कहना है कि विपक्षी दल के पास जरूरी दस फीसदी सीटें नहीं हैं जिसका मतलब है कि एलओपी पद पर दावे के लिए उसके पास 55 सीटें होनी चाहिए.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को जितनी गंभीरता से लिया है उसस केंद्र सरकार कटघरे में आ गयी है और अब तो ऐसा लगता है कि उसे इस मामले पर शायद ही कोई जवाब सुझे और मजबूर हो कर उसे सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद नेता विपक्ष को मान्यता देनी पड़ेगी.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने साफ कहा कि विधान को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता. इस पद के महत्व पर जोर देते हुए प्रधान न्यायाधीश आर एल लोढा की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि विपक्ष का नेता सदन में सरकार से अलग स्वर का प्रतिनिधित्व करता है.

पीठ ने कहा कि एलओपी लोकपाल कानून के तहत एक महत्वपूर्ण घटक है और मौजूदा राजनीतिक स्थिति में इस मुद्दे पर वस्तुनिष्ठ विचार की जरूरत है.पीठ ने यह भी कहा कि एलओपी का मुद्दा न केवल लोकपाल में प्रासंगिक है बल्कि यह मौजूदा और आगामी विधेयकों के मामले में भी महत्वपूर्ण है.

शीर्ष अदालत ने इस मामले में एक तरह से केंद्र की सरकार को चेतावनी देते हुए कहा है कि इस मामले को लंबा नहीं खींचा जा सकता और विधान को ठंडे बस्ते में नहीं डाला जा सकता. अदालत के सख्त तेवर का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसने मामले के अंतिम निपटान के लिए 9 सितंबर की तारीख तय कर दी.

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