अदालती फैसले से खुल गयी कुंअर की कलई

वही देवानंद कुंअर जो 21 मार्च 2013 तक बिहार के राज्यपाल थे.उन्होंने राज्यपाल पद की गरिमा को जितना नीचे गिराया, शायद ही किसी अन्य ने इस पद पर इतना बट्टा लगाया हो.devanand-kunwar

सोमवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भी यह साबित कर दिया है कि कुंअर ने अपने पद और प्रभाव का बड़ा दुरोपयोग किया है. सुप्रीम कोर्ट ने बिहार के विश्वविद्यालयों में कुलपति व प्रति कुलपतियों की नियुक्ति को गैरकानूनी ठहराते हुए निरस्त कर दिया है. कोर्ट ने कुलाधिपति (राज्यपाल) की जमकर आलोचना की और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाकर राज्य सरकार से परामर्श के बाद नए सिरे से नियुक्तियां करने के आदेश दिए.

राज्यपाल विश्वविद्यालयों के पदेन कुलाधिपति होते हैं. सो कुलपतियों की नियुक्ति की जिम्मेदारी उनकी होती है.

कुलपति बनाने के लिए दाम

देवानंद ने कुलपतियों की नियुक्ति में तमाम नियम कानून की धज्जियां उड़ा दीं. बिहार के शैक्षिणिक गलियारे में तो इन नियुक्तियों के मामल में यहां तक कानाफूसी हो रही थी कि तत्कालीन गवर्नर ने कुलपतियों की नियुक्ति में बैग भरे रुपये लिये थे. हद तो तब हो गयी जब कांग्रेस के एक विधायक ने विधानमंडल में यहां तक कह दिया कि कुलपति नियुक्ति की कितनी कीमत लगायी गयी. यह आरोप लगाने वाले विधायक कांग्रे के थे और तुर्रा यह कि देवानंद कंअर भी कांग्री हैं.

अब कोर्ट ने कुलपति व प्रति कुलपतियों की नियुक्ति की गत 9 फरवरी, 19 फरवरी व 14 मार्च 2013 की अधिसूचनाएं निरस्त करते हुए मनमाने रवैये की आलोचना की. कोर्ट ने नियुक्तियों में कुलाधिपति द्वारा अपारदर्शिता बरते जाने पर कड़ा एतराज जताया. कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति में अपनाई गई प्रक्रिया बिहार स्टेट यूनीवर्सिटी एक्ट व पटना यूनीवर्सिटी एक्ट के प्रावधानों के खिलाफ है.

इसके अलावा नियुक्तियों में हाईकोर्ट के आदेशों का भी उल्लंघन किया गया. पीठ ने कहा कि यह चौंकाने वाली बात है कि कुलाधिपति ने दो कुलपतियों व एक प्रति कुलपति की नियुक्ति ये जानते हुए भी कर दी कि उनके खिलाफ आइपीसी, एससी-एसटी प्रताड़ना कानून व भ्रष्टाचार निरोधक कानून में मामले लंबित हैं. कोर्ट ने निर्देश दिया है कि कुलाधिपति कानून में तय प्रक्रिया के मुताबिक कुलपतियों व प्रति कुलपतियों की नियुक्ति का पैनल तैयार करें.

कौन हैं कुंअर

त्रिपुरा के मौजूदा गवर्नर देवानंद कंअर ने अपने करियर की शुरआत कॉटन कॉलेज गुवाहाटी में लेक्चरर के रूप में शुरू की थी. 1969 में कुंअर ने गोवाहाटी हाईकोर्ट बार ज्वाइय किया और वहां प्रेक्टिस शुरू की. वह सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत करते रहे. वकालत से वह 1991 तक जुड़े रहे. इधर वह अपने छात्र जीवन में 1955 से ही कांग्रेस जुड़ गये थे.वह 1982 से 90तक असम कांग्रेस कमेटी के उपाध्यक्ष भी रहे.
कुंअर 29 जून 2009 को बिहार के राज्यपाल बनाये गये थे. तब लेकर उनके जाने तक उनके रिश्ते बिहार सरकार से कभी अच्छे नहीं रहे. राज्यपाल की नियुक्ति के मामले में कई बार बिहार सरकार ने कड़ी आपत्ति जताई. शिक्षा मंत्री पीके शाही ने तो कई बार उनके खिलाफ मोर्चा तक खाला. लेकि अब सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने कुंअर की कलई खोल कर रख दी है.

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