अब कुदरत से है नही गिला कोई, फूल काँटो में फिर खिला कोई

पटना, 8 सितम्बर। अब कुदरत से है नही गिला कोई / फ़ूल काँटों में फ़िर खिला कोई,  जानवर को जानवर कहें कैसे/ खुद जानवर हो रहा है आदमी/ सहरा में दो बूँद आब सी है ज़िन्दगी/ खूबसूरत मगर खाब सी है ज़िन्दगी……….……. इस तरह की दिल को छू लेने वाली पंक्तियों और आह-आह और वाह-वाह से आज गए शाम तक हिन्दी साहित्य सम्मेलन गुलज़ार रहा। मौका था गज़ल-गोष्ठी का, जो हिन्दी पखवारे के आठवें दिन सम्मेलन सभागार में आयोजित हुई।IMG_20160908_173146_BURST1

गज़ल-गोष्ठी की शुरुआत कवि-शायर विशुद्धानंद ने इन पंक्तियों से की कि, “अब कुदरत से है नही गिला कोई / फ़ूल काँटों में फ़िर खिला कोई। अब शहीदों की कब्र जागेंगी / दे गया छुप के इत्तिला कोई। फ़िर गज़ल दिल के तार छेड़ेगी / प्यार का होगा सिलसिला कोई”।

चर्चित शायरा अनुराधा प्रसाद ने सारी दुनिया के लिए मुहब्बत की दुआ इन शब्दों में की कि, “खड़ी हूँ हाथ फ़ैलाए तेरे दरबारे-आली में, मेरे मौला मेरी पूरी दुआ इस बार हो जाए / मेरी जानिब फ़कत अपनी मुहब्बत की नज़र कर दो, मोहब्बत से तुम्हारी, दिल मेरा सरेशार  हो जाए”।

युवा शायर परिमल ने कहा कि, “ तेरी बिनियाद में शामिल कैई मासूम चीखें हैं / इमारत बन रही होगी तो क्या मंज़र रहा होगा”। अर्जुन अक्श का कहना था कि, “अच्छा हुआ जो कल पे मेरी बात टाल दी / वरना तेरी ‘नही’ से बिखर जाता टूटकर”।

वरिष्ठ शायर नाशाद औरंगाबादी ने गज़ल के मायने इस तरह पेश किए कि, “इक ज़माने में दास्तान थी हुस्न की / अब फ़कत किस्सा-ए-बेबसी है गज़ल / पूछिए सच तो नाशाद के वास्ते / है गज़ल ज़िन्दगी, ज़िन्दगी है गज़ल”।

कवि इन्द्र मोहन मिश्र “महफ़िल” ने दुनिया के हालात का जायजा इन पंक्तियों में लिया कि, “ जा रहा है मुल्क कहाँ, कोई सोंचता नही / बारूद के हैं ढेर पर, कोई सोंचता नहीं /  एक हम हैं जो गैरों को भी कहा करते हैं अपना / कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनों को भी अपना नही कहते”।

 

गज़लगोष्ठी के अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने ज़िन्दगी को इस नज़रिये से देखा कि, “सहरा में दो बूँद आब सी है ज़िन्दगी / खूबसूरत मगर खाब सी है ज़िन्दगी / किस बात का गुमां है किस भरम में हो मीत / उफ़नती हुई नदी में नाव सी है ज़िन्दगी”।

सम्मेलन के उपाध्यक्ष पं शिवदत्त मिश्र, रामनाथ शोधार्थी, पंकज प्रियम, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, कुमारी मेनका, राज कुमार प्रेमी, सच्चिदानंद सिन्हा, आचार्य आनंद किशोर शास्त्री, प्रभात कुमार धवन आदि शायर-कवियों ने भी गज़लों का पाठ किया।

इस अवसर पर कवि ओम प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, विभा अजातशत्रु, शंकर शरण मधुकर, पं गणेश झा तथा शालिनी पाण्डेय सहित बड़ी संख्या में सुधी श्रोता उपस्थित थे।

 

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