आईएएस अफसरों को कठपुतली की तरह नचाने के खिलाफ याचिका

भारत के सबसे आकर्षक करियर यानी आईएएस की नौकरी की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि सरकारें इन्हें मनमर्जी गेंद की तरह लुढ़काती रहती हैं. नौकरशाहों की इस दशा पर पटना हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गयी हैLion_Capital_of_Ashoka

नौकरशाहों को नचाते रहने या एक जगह से दूसरे जगह समयपूर्व ट्रांस्फर करने को ले कर पटना हाई कोर्ट में दायर याचिका में उन तमाम अफसरों की सूची दी गयी है जिन्हें एक साल से भी कम समय में ट्रांस्फर कर दिया गया है. याचिकाकर्ता आमोद कुमार ने अदालत से आग्रह किया है कि इन अफसरों को एक साल से भी कम समय में ट्रांस्फर कर देने के कारण वे अपनी उपयोगिता साबित भी नहीं कर पाते क्योंकि वह किसी काम की शरुआत करते हैं जब तक उन्हें एक जगह से दूसरी जगह भेज दिया जाता है. इससे विकास से जुड़े तमाम कामों में रुकावट होती है.

इसका एहसा खुद टॉप लेवल के नौकरशाह भी करते हैं सरकारें उन्हें जब चाहें, जहां चाहें, नचाती रहती हैं. हद तो तब हो जाती है जब सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों में हस्तक्षेप करती है तो भी सरकारें अपने मन की ही करती हैं.

 

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों एक फैसले में कहा था कि अपरिहार्य हालात में ही अफसरों का समयपूर्व तबादला किया जाना चाहिए. आम तौर पर कमसे कम एक अफसर को एक पद पर तीन साल तक काम करने दिया जाना चाहिए.

इसी बात के मद्देनजर देश के 83 रिटार्यड नौकरशाहों ने सुप्रीम कोर्ट में 2013 में एक याचिका दायर की. इनमें पूर्व कैबिनेट सचिव टीआरएस सुब्रमणियम समेत कई नौकरशाहोंने अदालत से अपील की थी कि नौकरशाही को राजनीतिक दबाव से निजात दिलायी जाये.

अक्टूबर 2013 में सुप्रीम कोर्ट के एक बेंच ने अपने फैसले में कहा था  कि नौकरशाहों के लिए फिक्स्ड टर्म उके अंदर प्रोफेश्नलिज्म, कार्यक्षमता और सुशासन को बढ़ावा देने के लिए जरूरी है. हाईकोर्ट ने यहां तक कहा था कि नौकरशाही के काम कार्यनिष्पादन में सबसे बड़ी बाधा राजनीतिक दबाव है. इसी बात के मद्देनजर अदालत ने तमाम राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि वे तीन महीने के अंदर एक आदेश पारित करें जो सिविल सेवा के अधिकारियों के लिए निर्धारित अवधि पूरी करने संबंधी हो.

लेकिन अदालत के इस फैसले का राज्य सरकारों पर कोई फर्क नहीं पड़ा. अब देखना है कि पटना हाई कोर्ट में दायर ताजा अर्जी पर अदालत क्या रुख अपनाती है.

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