आईपीएस मंसूर अहमद ने अपनी ही सरकार से लड़ी कानूनी जंग और उसे झुकने पर मजबूर कर दिया

अपनी ही सरकार के खिलाफ कानूनी जंग लड़ना और जीत जाना आसान नहीं. लेकिन आईपीएस मंसूर अहमद ने यह लड़ाई जीत अपने माथे पर लगे निलंबन के दाग को मिटाने के लिए बिहार सरकार को मजबूर करके एक नजीर पेश कर दी,वह भी रिटायरमेंट से सात दिन पहले.

30 नवमबर को रिटायर हो रहे हैं मंसूर अहमद

30 नवमबर को रिटायर हो रहे हैं मंसूर अहमद

नौकरशाही ब्यूरो

अब बिहार सरकार के गृह विभाग ने सेंट्रल एडमिन्सट्रेटिव ट्रिब्युनल(कैट) के फैसले के आगे मजबूर हो कर आईपीएस मंसूर अहमद के निलंबन को रद्द कर दिया है.

कैट ने अपने हुक्मनामे में में गृह विभाग को जम कर फटकार लगाते हुए कहा है कि उसने इस मामले में दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया.  कैट ने कहा, “अधिकारियों ने इस मामले में दिमाग का इस्तेमाल नहीं किया इस बात का उल्लेख ट्रिब्युनल के पहले के आदेश में बी किया गया था” ट्रिब्युनल के सदस्य एके उपाध्याय और एसके पटनाइक ने कहा कि “आशा की जाती है कि ( गृह विभाग के)  हायर आथोर्टी अपने दिमाग का इस्तेमाल करेंगे. आवेदक पर लगे आरोप के मामले में तथ्यों को ध्यान में रखा जाना चाहिए था जो नहीं रखा गया. जब जांच पूरी हो गयी तो ऐसे में आवेदक( मंसूर अहमद) को निलंबन में रखे जाने की कोई जरूरत नहीं थी”.

कैट ने यहां तक कहा कि भ्रष्टाचार के आरोपों के अलावा किसी मामले में अधिकारी को एक साल से ज्यादा निलंबन में नहीं रखा जा सकता.

मंसूर अहमद को 21 अप्रैल 2016 को निलंबित कर दिया गया था. उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने सरकार की इच्छा के विरुद्ध अपनी बात मीडिया में कही. उन पर आरोप यह भी लगाया गया था कि उन्होंने गृह विभाग के प्रधान सचिव( आमिर सुबहानी) और मुख्यसचिव का अपमान किया था. गौरतलब है कि मंसूर अहमद ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि उनसे रिश्वत की मांग की जा रही है.

अब जबकि मंसूर अहमद का निलंबन खत्म हो गया है और उन्होंने अपने रिटायरमेंट के महज सात दिन पहले ज्वाइन कर लिया है . मंसूर ने कहा कि उन्हें गर्व है कि अब वह रिटायर हो कर निलंबन के दाग से मुक्त हो चुके हैं. उन्होंने कहा कि राज्य की नौकरशाही में फैले भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ यह उनकी जंग थी. और इस जंग में हुई जीत इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वह अगले हफ्ते रिटायर कर जायेंगे. उन्होंने कहा कि बड़े अफसरों की जीहुजूरी नहीं करना ही असल कारण था कि उन्हें प्रताड़ित किया गया. उन्होंने कहा कि कैट के इस फैसले से सरकार के चहेते अधिकारियों को सबक लेना चाहिए.

गौरतलब है कि मंसूर अहमद को 2001 में आईपीएस अफसर की हैसियत से पदोनत्ति मिली थी.

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