आखिर क्या है रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ धोखाधड़ी मामला?

एक तरफ आईएएस दुर्गाशक्ति नागपाल के निलंबन पर बावाल मचाने वाली कांग्रेस रॉबर्ट वाड्रा-डीएलएफ धोखाधड़ी की आईएएस अशोक खेमका की रिपोर्ट पर क्यों चुप है?vadra

आखfर सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और डीएलएफ जमीन सौदा विवाद है क्या?

2008 का मामला

अशोक खेमका की रिपोर्ट का जिन्न फिर बाहर आ गया है और संसद में हंगामा बरपा है. दर असल अशोक खेमका की रिपोर्ट के मुताबिक यह मामाला प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा की कम्पनी स्काई लाइट्स हॉस्पिटैलिटिज ने 2008 में ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से साढ़े तीन एकड़ जमीन फर्जी कागजात के आधार पर खरीदी थी. जमीन का सौदा साढ़े सात करोड़ में दिखाया गया. रजिस्ट्री में कॉरपोरेशन बैंक के चेक से भुगतान दिखाया गया. इसके बाद वाड्रा ने हरियाणा सरकार से (कांग्रेस शासित) से जमीन पर कॉलोनी बनाने का लाइसेंस लेकर 2008 में ही उसे 58 करोड़ रुपये में डीएलएफ को बेच दिया.

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वाड्रा-डीएलएफ सौदेबाजी पर सरकार के मन में चोर

रिपोर्ट के मुताबिक जांच में पता चला कि जमीन खरीदने के लिए वाड्रा ने साढ़े सात करोड़ रुपये की कोई पेमेंट की ही नहीं थी. रिपोर्ट में आरोप है कि वाड्रा ने 50 करोड़ रुपये लेकर डीएलएफ को सस्ते में लाइसेंसशुदा जमीन दिलवाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका अदा की. अशोक खेमका के वकील अनुपम गुप्ता ने कहा कि ये सब फर्जीवाड़ा था. डीएएलएफ को कॉलोनी बनाने के लिए लाइसेंस चाहिए था. इसके लिए उसको कई सौ करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते लेकिन वाड्रा ने बिचैलिए की भूमिका निभा कर यह काम सिर्फ 50 करोड़ रुपये में करवा दिया.

इस डील को राज्य के तत्कालीन इंस्पेक्टर जनरल रजिस्ट्रेशन अशोक खेमका ने रद्द कर दिया था. उसके तत्काल बाद उनका तबादला कर दिया गया था.हरियाणा के पूर्व इंस्पेक्टर जनरल रजिस्ट्रेशन अशोक खेमका ने 21 मई 2013 को राज्य सरकार की जांच कमेटी को दिए जवाब में ये रिपोर्ट दी है. इसी रिपोर्ट में खेमका ने सभी रहस्यों से परदा उठा दिया है और खेमका ने वाड्रा की कंपनी पर फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं.

इधर विभाग का कहना है कि जमीन सौदे से लेकर कॉलोनी के लाइसेंस देने तक में कुछ भी गैरकानूनी नहीं हुआ. वहीं, इंस्पेक्टर जनरल रजिस्ट्रेशन रहते हुए वाड्रा लैंड डील रद्द करने वाले खेमका आरोपों पर अब भी डटे हैं.

इधर हरियाणा सरकार ने इस डील पर एक जांच कमेटी बना दी थी लेकिन खेमका को इस कमेटी पर भरोसा नहीं है.उनकी दलील है कि जांच कमेटी के तीन अफसरों में एडीशनल प्रिंसिपल सेक्रेटरी कृष्ण मोहन और एस एस जालान हैं. खेमका के मुताबिक वाड्रा जमीन सौदे के वक्त कृष्ण मोहन खुद राजस्व विभाग के प्रमुख थे. जबकि जालान वाड्रा की कंपनी को कॉलोनी काटने का लाइसेंस देने वाले टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के प्रमुख थे.

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