आखिर खुला भेद: मुलायम ने भाजपा के इशारे पर नहीं, बेटे के दबाव में तोड़ा था गठबंधन

:कभी-कभी लाख कोशिशों के बावजूद राजनीति की कई गुत्तथियां नहीं खुल पातीं. लेकिन कभी-कभी ऐसा समय खुद ही आ जाता है कि ये गुत्थियां समय खुद खोल देता है.2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के पहले मुलायम सिंह के नेतृत्व में भाजपा के खिलाफ महागठबंधन बना था. लेकिन चुनाव के ऐन पहले मुलायम जो इस गठबंधन के गार्डियन घोषित किये जा चुके थे, खुद ही अलग हो गये.th

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इस सारे घटनाक्रम को बीते अब एक साल होने को है. लेकिन अचानक समय ने ऐसा पलटा खाया कि उस समय यह बात सामने न आ सकी कि मुलायम की ऐसी क्या मजूरी थी कि उन्होंने खुद को गठबंधन से अलग कर लिया और देश भर के समाजवादियों की आलोचना सहने की स्थिति उन्होंने मोल ले ली. लेकिन अब जब उनका कुनिबा आपस में घमासान का शिकार है तो चीजें साफ होने लगी हैं. और अब लगभग यह बात खुल कर सामने आ गयी है कि मुलायम अपने पारिवारिक उलझनों के कारण गठबंधन से हटने को मजबूर हो गये थे. पिछले दिनों नीतीश कुमार ने भी इस बात की ओर इशारा कर ही दिया कि अब लोगों को समझ में आ गया होगा कि महागठबंधन से मुलायम ने खुद को क्यों अलग कर लिया था.

दर असल मुलायम परिवार में सत्ता संघर्ष इस स्तर पर पहुंच चुका है कि घर के अंदर का विवाद अब घर फूटे गवांर लूटे की स्थिति में आ चुका है. अब चूंकि मुलायम ने अपने भाई और सबसे विश्वस्त सेनापति को दिल्ली कूच कर दिया है ताकि वह फिर से महागठबंधन की संभावनाओं को तलाश सकें, तब इस राज का रहस्य लगभग खुल सा गया है कि मुलायम को गठबंधन से अलग होने के लिए उनके ही कुनबे के लोगों ने मजबूर सा कर दिया था. शिवपाल ने इस तरफ इशारा भी कर दिया है कि उस समय रामगोपाल यादव ने कुछ ऐसी स्थितियां पैदा की जिसके कारण मुलायम को महागठबंधन से अलग होना पड़ा था. दर असल शिवपाल का रामगोपाल के बहाने, अखिलेश यादव पर निशाना है. शिवपाल की बातों का सारांश यह है कि अखिलेश यादव को राम गोपाल ने तब यह समझा दिया था कि अगर समाजवादी पार्टी महागठबंधन का हिस्सा बनी तो ऐसी स्थिति में अखिलेश यादव की पकड़ पार्टी पर से ढ़ीली हो जायेगी. आप को याद होगा कि जब लालू प्रसाद, मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और अन्य समाजवादी सोच वाले नेता पहली बार मिले थे तो यह तय हुआ था कि सभी समाजवादी क्षेत्रीय दल आपस में विलय करेंगे और नयी पार्टी का नाम समाज जनता पार्टी या समाजवदी जनता दल नामक राजनीतिक पार्टी के रूप में नयी पार्टी का गठन हो सकता है. ऐसे में मुलायम सिंह यादव को प्रस्तावित दल का कंवेनर तक घोषित कर दिया गया था. लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलने शुरू हुए और बाद में इस विलय को टाल दिया गया. फिर बात महागठबंधन के गठन तक पहुंच गयी और फिर नतीजा यहां तक पहुंचा कि मुलायम को खुद को इस गठबंधन से अलग होने का फैसला करना पड़ा.

अब यह बात भी लगभग स्पष्ट हो चुकी है कि राम गोपाल यादव जो अखिलेश यादव के खास सलाहकार की भूमिका में रहे हैं, ने अखिलेश को यह समझाने में सफलता हासिल कर ली थी कि अगर उनकी पार्टी का विलय हो गया तो न सिर्फ अखिलेश की पकड़ पार्टी पर से ढ़ीली हो जायेगी बल्कि कालांतर में सीएम की उनकी कुर्सी भी खतरे में पड़ जायेगी. और अब लगभग यह गुत्थी सुलझ सी गयी है जब मुलायम ने खुद अपने सेनापति शिवपाल यादव को दिल्ली भेज कर इस बात के लिए जमीन तैयार करने को कहा है कि वह यह सुनिश्चित करने की कोशिश करें कि भारतीय जनता पार्टी से लोहा लेने के लिए एक नय महागठबंधन को कैसे खड़ा किया जाये.

हालांकि शिवपाल की इस पहल को तत्काल अजित सिंह का समर्थन मिल गया है लेकिन आगे के क्या हालात बनेंगे यह तय किया जाना बाकी है. शिवपाल शरद यादव समेत अन्य नेताओं से मिलने वाले हैं. उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाला है. ऐसे में अब अगर अखिलेश मुलायम के आगे समर्पण नहीं करते हैं तो उनकी कोशिश होगी कि वह उन्हें हाशिये पर ला कर दम लेंगे. अब देखना है कि इस मामले में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद क्या रुख अपनाते हैं.

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