आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री साहित्य के थे गौरव-स्तम्भ : डॉ अनिल सुलभ

हिंदी साहित्य के पुरोधा और गीत के शलाका-पुरुष आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री बिहार के हीं नही, साहित्य-संसार के गौरव-स्तम्भ थे. उक्‍त बातें महाकवि आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री की जयंती पर हिंदी साहित्‍य सम्‍मेलन पटना, में आयोजित समारोह और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए सम्मेलन अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ ने कही.

नौकरशाही डेस्‍क

उन्‍होंने कहा कि वे संस्कृत और हिंदी के मूर्द्धन्य विद्वान तो थे हीं, साहित्य और संगीत के भी बड़े तपस्वी साधक थे. कवि-सम्मेलनों की वे एक शोभा थे. अपने सुरीले कंठ से जब वे गीत सुनाते थे, हज़ारों-हज़ार धड़कने थम सी जाती थी. मोहित करने वाले उनके धुन निराले थे. कवि-सम्मेलनों के मंच पर उनकी बराबरी राष्ट्र-कवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ और गीतों के राज कुमार गोपाल सिंह नेपाली के अतिरिक्त कोई भी नहीं कर सकता था.

डॉ सुलभ ने कहा कि यदि बिहार में जानकी जी और नेपाली जी नहीं होते तो हिंदी साहित्य से गीत की अकाल मृत्यु हो जाती. उन्‍होंने अपनी साहित्यिक-यात्रा संस्कृत-काव्य से आरंभ की थी. लेकिल महाप्राण निराला के निर्देश पर उन्होंने हिंदी में काव्य सृजन आरंभ किया और देखते हीं देखते गीत-संसार के सुनील आसमान में सूर्य के समान छा गए. साहित्य की सभी विधाओं में जी भर के लिखा. कहानी, उपन्यास, संस्मरण, नाटक और ग़ज़लें भी लिखी. उनके गीतों से होकर गुज़रना दिव्यता के साम्राज्य से होकर गुज़रने के समान है.  उनकी ‘राधा’ उच्च श्रेणी के महाकाव्य में परिगणित होती है.

इसके पूर्व अतिथियों का स्वागत करते हुए सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त ने महाकवि के साहित्यिक-कृतित्व की सविस्तार चर्चा की और उन्हें गीत का शिखर-पुरुष बताया. समारोह के मुख्य अतिथि और मधेपुरा विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो अमरनाथ सिन्हा ने जानकी जी के साथ बिताए अपने कुछ अंतरंग क्षणों का स्मरण करते हुए कहा कि, आचार्य जी की विद्वता और साहित्य की साधना को आंक पाना संभव नही है. वे दुर्लभ साहित्यिक व्यक्तित्व थे.

वहीं, सम्मेलन के उपाध्यक्ष और कवि पं शिवदत्त मिश्र का उनकी ७७ पूर्ति पर अभिनंदन किया गया. सम्मेलन अध्यक्ष डॉ सुलभ ने पुष्प-हार तथा वंदन-वस्त्र प्रदान कर उनका सम्मान किया. उनकी दीर्घायु की कामना करते हुए डा सुलभ ने उन्हें एक समर्थ कवि और संपादक बताया. साहित्य सम्मेलन के लिए किए जा रहे उनके कार्यों की भी प्रशंसा की. उपस्थित साहित्यकारों ने पुष्प-हार के साथ उनके दीर्घ-जीवन की मंगलकामनाएं की.  इस अवसर पर आयोजित कवि-सम्मेलन का आरंभ सम्मेलन के उपाध्यक्ष और वरिष्ठ कवि मृत्युंजय मिश्र ‘करुणेश’ ने अपनी ग़ज़ल पाठ से महाकवि की स्मृति को ताज़ा कर दिया. उन्होंने भारत सरकार से जानकी जी के लिए ‘भारत-रत्न’ प्रदान करने की मांग की.

इस अवसर पर प्रो सुशील कुमार झा, डा नागेश्वर यादव, ई चंद्रदीप प्रसाद ने भी अपने विचार व्यक्त किए. मंच का संचालन कवि ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन प्रबंध मंत्री कृष्ण रंजन सिंह ने किया.

 

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