आदरणीय नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी… नमस्कार

नीतीश मिश्र नामक एक युवक ने नरेंद्र दामोदर दास मोदी को चिट्ठी लिखी है और बताने की कोशिश की है कि उन्होंने यमुना के प्रवाह में छुपे मर्म को समझने के बजाये अपने 9 महीने पुराना राग अलापा और दिल्ली हार गये.narendra_modi

आदरणीय भाई नरेन्द्र दामोदर दासजी,

नमस्कार

दिल्ली देश की धड़कन है और आप उसके जुबां है। लेकिन आपकों क्या इल्म हुआ कि आप अपने नौ महीने के कार्यकाल में कभी दिल्ली की जुबां बोल पाए हो? नहीं न। यदि आपने इन नौ महीनों में दिल्ली की भाषा सीख ली होती तो कुरूक्षेत्र के इस जंग मे आप घायल नहीं होते। लेकिन आप बुरी तरह से इस बार घायल हो गए है। आपके घायल होने से विरोधियों के पर पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हो गए है। एक बात तो आप अच्छी तरह जानते होंगे नरेन्द्र भाई कि युद्ध जीतने के लिए सारे हथियार जायज होते है, तो वहीं एक बात आप अच्छी तरह से यह भी जानते होंगे कि सारे युद्ध एक जैसे हथियार से भी नहीं जीते जा सकते है। आप से यही चूक हो गई। आप ने नौ महीने के अंदर जितने भी युद्ध लड़े सबमें एक ही जैसा हथियार का प्रयोग किया। आप खुद सोचिए एक हथियार कितनी बार अपनी विश्वनीयता बरकरार रख सकेगा।

यदि आप दिल्ली को जितने से पहले दिल्ली का इतिहास कुरूक्षेत्र से लेकर मुगलों तक का इतिहास पढ़ लिए होते तो सही में आप दिल्ली का युद्ध जीत लेते। लेकिन आप के ऊपर एक सनक सवार थी, आप अपने से ज्यादा काबिल किसी दूसरे को मानने को तैयार नहीं हो पाए। आप खुद सोचिए आप उस दिल्ली से शासन चला रहे है जहां न जाने कितने राजा- महाराजों ने हिंदुस्तान पर शासन किया है। दिल्ली का हर राजा अपने समकालीन विद्वानों से लेकर पंडितों तक से राय- मशवहरा करता रहता था। लेकिन आप ने  ऐसा कुछ नहीं किया.

जनता ने मजबूर में चुना आपको
नरेन्द्र भाई आप खुद सोचिए जिस उत्तर प्रदेश की जनता से आपकों इतना बड़ा जनादेश जो मिला था वह जनादेश सही मायने में लोगों ने कांग्रेस से क्षुब्ध होकर आपकों दिया था न कि सपा और बसपा से। क्योंकि वहां की जनता को यह बात अच्छी तरह से मालूम थी कि बसपा और सपा को वोट देने का मतलब है कि अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस को वोट करना । इसलिए यूपी की जनता ने खुलकर आपके पक्ष में मतदान किया। आप खुद सोचिए आपकों मजबूरी में ही हर जगह जनता ने मौका दिया और आपने जनता की इस मजबूरी को अपनी ताकत समझ लिया ।

लेकिन दिल्ली में जनता के पास कोई मजबूरी नहीं थी। इसलिए उसने खुले तौर पर केजरीवाल का साथ दिया। आपकों एक बात और बता दूं,  आने वाले समय में जब बिहार और उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले है। वहां आप कितने भी कुलांचे मारिएगा हाथ कुछ नहीं आने वाला है। क्योंकि वहां पर आपकों बसपा कांग्रेस और सपा से भिड़ना होगा। आपके नौ महीने के कार्यकाल को जनता देखकर तो यह भलि भांति समझ गई है कि आपकों डींगे मारने के अलावा और कुछ नहीं आता है।

वही पुराना जुमला

नरेंद्र भाई आप जैसे रणनीतिकार से चूक हो गई कि दिल्ली की सियासत में आप पिछड़ गए। वैसे एक बात बता दूं नेरन्द्र भाई दिल्ली की सियायत उसी व्यक्ति को भाती है जिसके पास एक ठोस विचार हो। दिल्ली के इस चुनाव में कायदे से आपकों इस बात को स्वीकार करना चाहिए कि आपके कोई विचार नहीं था , बल्कि वहीं पुराना जुमला लेकर आप दिल्ली में दहाड़ रहे थे जो पिछले एक साल से लोग सुन रहे थे- चलो मोदी के साथ।

भला आप खुद सोचिए जिसके पास अपना दिमाग होगा और हाथ- पांव वह शख्स भला आपके साथ चलने को कैसे तैयार हो सकता है। आपके साथ तो वहीं चल सकता है जिसके पास अपना कोई निजी मूल्य नहीं हो। वह भी उस जनता को आप अपने साथ लेकर चलने की अपील कर रहे थे जिसकी थाती पूरी दुनियां में सुनाई देती है। दिल्ली की जनता अपने को बहुत ही ज्यादा परिपक्व समझती है। भले ही उसे दो वक्त की रोटी दाल जुगाड़ करने में पसीने आते हो, लेकिन सोच के मामले में वह खुद को आभिजात्य क्लास से किसी भी मामले कमतर नहीं है। क्योंकि दिल्ली की जनता को यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि हिंदुस्तान की सियासत की कुंजी यमुना के किनारे से बनती है। गंगा किनारे तो वह कुंजी अपनी करिश्मा भर दिखाती है। आपसे यहीं चूक हो गई। यदि हम किसी भी शहर के किनारे स्थित नदी के मर्म को समझ ले तो हम समाज को समझने में कभी भूल नहीं कर सकते। और आप पिछले नौ महीने से दिल्ली में दहाड़ रहे है। आप कभी समय निकालकर यमुना किनारे गए होते तो आप समझ जाते कि दहाड़ने से कहीं ज्यादा बेहतर है यमुना की तरह धीर – गंभीर होकर अपने काम को अमली जामा पहनाना।

आपका

नीतीश मिश्र

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