आप इतने व्यथित व बेबस क्यों हो जाते हैं मुख्यमंत्री जी?

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

आइरन मैन की छवि वाले मुख्यमंत्री जी कभी कभी आप इतने व्यथित, इतने बेबस क्यों हो जाते हैं? जबकि राज्य की नौकरशाही, मंत्रियों की फौज और और पूरी व्यवस्था आपके सामने नतमस्तक है, विपक्ष के आक्रमण, विरोधियों के आरोप सब को आप धुएं की तरह उड़ा देते हैं. पर सिर्फ एक ही बात है जिसके सामने आप बेबस हो जाते हैं.

यह मामला है कुलपति नियुक्त में राजभवन की मनमानी का.

साभार फर्स्ट पोस्ट

यह सच है कि राजभवन कुलपतियों की नियुक्ति के मामले में आपकी सरकार की एक नहीं सुनता.आप अदालत जाते हैं, फैसला आपके पक्ष में आता है. फिर भी मामला ढाक के तीन पात ही रहता है. इस बार भी राज्यपाल देवानंद कुंअर ने आठ कुलपतियों की नियुक्ति कर दी, आप से कुछ पूछा, न कहा.

मुख्यमंत्री जी आपकी व्यथा इस मामले में फिर कल सामने आ गई. आपने कहा-“यह विकट स्थिति है.मैं क्या कर सकता हूं? परंपरागत तौर पर कुलपतियों की नियुक्ति में सरकार की जो भूमिका रही है वह भी समाप्त हो गयी है.”

ऐसा नहीं है कि राजभवन का यह रवैया पहली बार सामने आया है. इससे पहले भी राजभवन ने आपसे कभी मश्विरा नहीं किया. इस मामले में जनहित याचिका भी दायर की गई. हाईकोर्ट ने बीते 7 दिसम्बर को कुलपतियों की नियुक्ति तक रद्द कर दी. राजभवन से कहा कि राज्य सरकार से परामर्श कर कुलपतियों को नियुक्ति करें.

इस बात से आपकी सरकार को थोड़ी राहत तो मिली पर इसका भी कोई असर राजभवन पर नहीं हुआ. और राजभवन ने फिर वही किया, जो उसकी मरजी में था.
ऐसे में मुख्यमंत्री जी आपको कहना पड़ा- “राजभवन ने राज्य सरकार से इस बार भी किसी तरह का परामर्श नहीं किया. कोर्ट के निर्णय के हिसाब से जो विमर्श किया जाना चाहिए था, वह नहीं हुआ”.

अहम सवाल

मुख्यमंत्री जी अदालत के फैसले और विश्वविद्यालय अधिनियम आपके पक्ष में है.इसके अनुसार कुलिपतियों की नियुक्ति के लिए राजभवन को सरकार से परामर्श करना चाहिए. लेकिन राजभवन के पक्ष में सिर्फ यह बात जाती है कि विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति राज्यपाल हैं. तमाम विश्वविद्यालयों के सबसे बड़े प्रशाक. ठीक वैसे ही जैसे आप बिहार के सबसे शक्तिशाली प्रशासक हैं. कह सकते हैं बिहार के कुलाधिपति तो आप हैं.

इस स्थिति में एक सवाल है मुख्यमंत्री जी; करने दें राजभवन को अपनी मनमानी और अदालत को अपना काम. आपके लिए करने को इतना कुछ है, फिर आप क्यों अपनी ऊर्जा, अपना बहुमूल्य समय इस मामले में खर्च करते हैं, जबकि आप जानते हैं कि राजभवन आपकी एक नहीं सुनता ?

राज्य की सारी नौकरशाही आपकी है. तमाम मंत्री, तमाम नौकरशाह यहां तक कि निगम, बोर्ड, आयोग के एक-एक अधिकारी-कर्मचारी की नियुक्ति आपकी सरकार के इशारे के बिना संभव ही नहीं है. इतना ही नहीं एक चतुर्थवर्गीय कर्मचारी भी आपकी सरकार ही नियुक्त करती है, गोया कि इस राज्य के कुलाधिपति हैं आप. मुख्यमंत्री जी मैं फिर दोहराता हूं कि विश्विद्यालय अधिनियम और अदालत का निर्देश आपके पक्ष में है तो भी राजभवन आपकी बातों पर ध्यान तक नहीं देता. ऐसे में क्या जरूरत पड़ी है कि इस मामले पर इतनी ऊर्जा, इतना समय खपाया जाये. जबिक आपका पल-पल राज्य की दस करोड़ जनता के लिए है. आप की हर सांस से जनता की उम्मीदें टिकी हैं. न्याय के साथ विकास की बहुत बड़ी चुनौती आपने अपने सर ले रखी है.

इसलिए मैं आग्रह करूंगा कि आप जनता के लिए जिस बेचैनी से सोचते हैं, करते हैं, रातों की नींद और दिन का चैन दस करोड़ लोगों के लिए निछावर करते हैं, उसे जारी रखें.

आखिर राजभवन एक सांकेतिक संस्था भर ही तो है. केंद्र का प्रतिनिधि. बस थोड़े से अधिकार के सिवा राजभवन के पास है ही क्या- राज्य के विश्विविद्यालय ही न? बाकी सब तो आपकी सरकार का ही है.

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