आरटीआई खुलासा:सच्चर कमेटी पर एक भी आदेश नहीं दिया अखिलेश सरकार ने

आरटीआई कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने दो साल की मशक्कत के बाद आखिरकार पता लगा लिया है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर अमल करने का अभी तक एक भी आदेश पारित नहीं किया है.Mulayam-Akhilesh-Azam-PTI

इस सनसनीखीजे खुलासे से समाजवादी पार्टी के मुस्लिम प्रेम को ढकोसला तो उजागर हो ही गया है, यह भी साफ हो गया है कि अल्पसंख्यक कल्याण का ढोंग रचने वाले आजम खान अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के अलावा कुछ नहीं करते और उन्हें भी अल्पसंख्यकों के कल्याण से कोई लेना देना नहीं है.

उर्वशी शर्मा की रिपोर्ट

मैं तो आश्चर्यचकित हूँ कि उच्च पदों पर आसीन नेता सार्वजनिक जीवन में कितना सफेद झूंठ बोलते है और जाने कैसे इतना सफेद झूंठबोल लेते हैं. जाने कैसे ये लोग हर जगह जन सरोकार के मुद्दे नहीं बल्कि अपना व्यक्तिगत लाभ और अपने वोट ही तलाशते रहते है .

जब मुसलमानों के बारे में सोचती हूँ और देखती हूँ तो पाती हूँ कि वैसे तो मुलायम सिंह अपने आप को मुसलमानों का मसीहा कहते है और गाहे-बगाहे अयोध्या- बाबरी मस्जिद प्रकरण पर भोले भाले मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं को भड़काकर उनको अपने पाले में करने का प्रयासकरते हैं तो वही मायावती हैं जो जब तब मुस्लिम हितों को सर्वोपरि बताते हुए विशाल रैलियां करते हुए मुसलमानों को लुभाने का प्रयास करती है.

अखिलेश से ज्याद स्वतंत्र  थे मनमोहन 
लगभग 3 साल के अपने कार्यकाल में अखिलेश ने तो अपने आपको वहाँ खड़ा कर दिया है जहाँ जनता ने उनसे कोई भी उम्मीद करना हीछोड़ दिया है. मेरा मानना है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी अखिलेश से अधिक स्वतंत्र निर्णय ले लेते थे. पर इन सबमें मुसलमानों केजमीनी विकास के मुद्दे कही पीछे छूटते जा रहे हैं और सरकारें और विपक्ष अपने फायदे के लिए बेबजह की बयानबाजी से आगे नहीं आ पाया है .

गौरतलब है कि 9 मार्च 2005 को भारत के प्रधानमंत्री ने भारत में मुसलमानों के सामाजिक,आर्थिक और शैक्षिक स्थिति के आंकलन के लिएसात सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन किया था| जस्टिस सच्चर की अध्यक्षता वाली इस समिति ने 17 नवम्बर 2006 को अपनीशिफारिशें प्रधान मंत्री को सौंप दीं जो 30 नवम्बर 2006 को लोक सभा के पटल पर रखीं गयीं.

मैंने क्या जानना चाहा

मैंने उत्तर प्रदेश सरकार से आरटीआई के तहत यह जानना चाहा था कि आखिर मुसलमानों के हितों का ढोल पीटने वाली सरकारों ने इस रिपोर्ट पर अमल कर मुसलमानों का बुनियादी विकास कर उनको समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए क्या किया है. आपको यह जानकारआश्चर्य होगा कि एक माह में सूचना देने की अनिवार्यता होने पर भी इस अहम् मुद्दे पर उत्तर प्रदेश सरकार ने मुझे सूचना देने में 2 साल से भीअधिक लगा दिए और अब सूचना आयोग के दखल के बाद उत्तर प्रदेश शासन के अल्पसंख्यक कल्याण एवं वक्फ अनुभाग-4 के उप सचिव और जन सूचना अधिकारी आर. एन. द्विवेदी ने बीते 11 फ़रवरी के पत्र के माध्यम से जो सूचना दी हैं वह बेहद चौंकाने वाली होने के साथ साथ उत्तर प्रदेश की सरकारों के कथित मुसलमान-प्रेम की ढोल की पोल भी उजागर करती है.rti sacchar urv 2015

 

 

ये मिला जवाब

आर. एन. द्विवेदी के इस पत्र के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा सच्चर कमेटी की संस्तुतियों को प्रभावी ढंग से लागू करने हेतु अभी तक कोई नियम /विनियम/शासनादेश आदि निर्गत नहीं किया गया है| आर. एन. द्विवेदी ने इस सम्बन्ध में शून्य सूचना का होना भी लिखा है.

यह हाल उस सरकार का है जिसके सिपहसालार आज़म ख़ान अपने आपको मुसलमानों का झंडाबरदार सिद्ध करने के लिए संवैधानिक पद परआसीन राज्यपाल तक को भी गाहे-बबगाहे ताल ठोंककर ललकारते रहते हैं पर उत्तर प्रदेश के मुसलमानों की सामाजिक,आर्थिक और शैक्षिकस्थिति में योजनाबद्ध सुधार लाने के लिए सच्चर कमेटी की शिफारिशों पर अपने महकमे से भी कोई भी कार्यवाही नही करा पाते हैं. अब आज़मख़ान को मुसलमानों के विकास से तो कोई सरोकार है नहीं. उनको तो मतलब है बस अपने आप से और इन तीन सालों में उन्होने अपने हित तो खूब साधे हैं. जी हाँ, मेरा मतलब है अपनी पत्नी को लोकसभा में भेजना,रामपुर में अपने ट्रस्ट की माली हालत को ठीक करना, रामपुर में अपनीराजनैतिक ज़मीन को मजबूती देने को कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना आदि आदि. और फिर उनको फ़ुर्सत ही कहाँ है सस्ती लोकप्रियता पाने और खबरों में बने रहने के लिए बेबजह की बयानबाज़ी करने से जो वह मुसलमानों के विकास के बारे में सोचें.

बड़ा सवाल यह भी है कि 30 नवम्बर 2006 से अब तक की आठ साल से ज्यादा की अवधि में मुलायम सिंह,मायावती और अखिलेश जैसे अपनेआप को मुसलमानों का झंडाबरदार कहने वाले नेता सूबे के मुखिया रहे हैं जो जब-तब मुसलमानों के लिए लोक लुभावन घोषणाएं तो प्रायः हीकरते रहे है पर यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रदेश के मुसलमानों के बुनियादी मुद्दों को सम्बोधित करने वाली इस रिपोर्ट पर सिलसिलेवार अमल कर मुसलमानों को सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक रूप से आत्मनिर्भर बनाकर उनको समाज की मुख्यधारा में लाने का कोई भी प्रयास किया हीनहीं गया है.

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