आरटीई एक्ट के चक्रव्यूह में राज्य सरकारें

शिक्षा अधिकार अधिनियम लागू करने की मयाद खत्म हो गयी पर एक सर्वे के मुताबिक महज 15 फीसदी स्कूल ही इसी पूरी तरह से लागू करने की स्थिति में हैं.

1 अप्रैल से इस अधिनियम को देश भर में लागू करने का निर्देश केंद्र सरकार ने दे रखा है.

आरटीई के मुताबिक साल भर में 200 दिन पढ़ाई होना जरूरी है लेकिन शिक्षा के अधिकार से जुड़े फोरम ने अपने सर्वे में पाय है कि महज 15 फीसदी स्कूलों में ही ऐसा हो रहा है.
इधर मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने किसी भी हाल में राज्यों को शिक्षा के अधिकार अधिनियम को एक अप्रैल से लागू करने के अपनी मयाद को आगे बढ़ान से मना कर दिया है. जबकि कई राज्यों की सरकारों के लिए यह अधिनियम लागू करना असंभव लग रहा है.

फोरम के सर्वे के मुताबिक केवल 50 फीसदी स्कूलों में बाउंड्री वॉल है जबकि शिक्षकों के कॉमन रूम एक तिहाई स्कूलों में ही हैं. 58 फीसदी स्कूलों में ही बच्चों के खेलने का मैदान है. 77 फीसदी स्कूलों में पीने के साफ पानी की सुविधा है. हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में तो 25 फीसदी से भी कम स्कूलों में पानी की सुविधा है. 25 फीसदी स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय की सुविधा नहीं है. ऐसे में फोरम ने इस मामले में सीधे प्रधानमंत्री से दखल देने की मांग की है.

सरकार ने शिक्षा का अधिकार कानून लागू करने की समय-सीमा बढ़ाने से इनकार कर दिया है लेकिन जिन स्कूलों ने इसे लागू नहीं किया, उनके खिलाफ कार्रवाई करने का अधिकार राज्य सरकारों के पास है.

लेकिन चुंकि स्कूलों की सविधा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों की है इसलिए वह स्कूलों के खिलाफ कार्रवाई करने का नौतिक अधिकार नहीं रखतीं.

ऐसे में देखना है कि राज्य सरकार इस समस्या से कैसे निपटती है.

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