आर्थिक सर्वेक्षण: खजाना भरा, काम अधूरा

बिहार सरकार आंकड़ों की बाजीगरी की कोशिशों के बावजूद 2012-13 में कुल बजट का 60-65 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर सकी है.यानी पैसों का रोना रोने वाली सरकार अपने बजट का 35 प्रतिशत अभी तक खर्च भी नहीं कर सकी है.

जबकिह डेढ़ महीने में यह साल खत्म होने वाला है.

मंगलवार को राज्य के वित्तमंत्री सुशील कुमार मोदी ने 2012-13 का आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया.जिसमें इस बात को स्वीकर किया गया है.

लगातार यह चौथा साल है जब राज्य सरकार अपने बजट में निर्धारित रकम को खर्च करने में विफल रही है.

अर्थशास्त्री नवल किशोर चौधरी का कहना है कि राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही की असफलता का यह एक बड़ा उदाहरण है. उन्होंने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा कि यह तो ठीक वैसे ही हुआ जैसे किसी आदमी के पास पैसे तो हैं पर उसे पैसे का इस्तेमाल कहां और कैसे करे, इसकी जानकारी ही नहीं है.

हालांकि सरकार ने इस संबंध में अपनी पीठ खुद अपने ही हाथों थपथपाते हुए कहा है कि विकास व्यय पिछले वर्ष 50 प्रतिशत के बजाये इस वर्ष 65 प्रतिशत हो गया है.लेकिन सरकार के कई विभागों के आधिकारिक सूत्रों ने नौकरशाही डॉट इन को बताया है कि कई विभाग ऐसे हैं जिन्होंने अपनी आवंटित राशि का अभी तक 35 प्रतिशत हिस्सा भी नहीं खर्च कर सके हैं.

यानी दस महीने में सरकार महज एक रुपये में बमुश्किल 30 पैसे ही खर्च कर सकी है और 70 पैसे खजानों में अब भी पड़े हैं. जबकि अगले डेढ़ महीने में उनपर 70 प्रतिशत राशि खर्च करने की चुनौती है, जो कि किसी भी हाल में संभव नहीं है.

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