इक चिराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए

गालिब सामाजिक सरोकारों के सरकारी सेवक हैं.इस गंभीर लेख में उन्होंने बुनियादी शिक्षा में सरकारों के रवैये की बखिया उधेड़ दी है और उम्मीद जतायी है कि सरकारें अपना रवैया बदलेंगीRear view of class raising hands

हमरे कमइया पे कोठा आटारी, हमरे बेदरा स्कूलवा से दूर रे महन्थवा या यो कहें कि ‘‘कहां तो तय था चरागां हरेक घर के लिये, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहरों के लिये’’ .इन दो अर्थपूर्ण पंक्तियों की व्यापक परिधि में भारतीय लोकतन्त्र के सर्वोच्च मंदिर (संसद) द्वारा पारित (देषज बच्चों के लिये) ‘‘शिक्षा अधिकार कानून-2009 को समझा समझना होगा- जिसकी तीन साल समय अवधि 31 मार्च, 2013 को पूरी हो चुकी है.

यहाँ उल्लेखनीय है कि इन तीन सालों के समयबद्ध (1 अप्र्रैल, 2010 से 31 मार्च, 2013) में सरकारों (केन्द्र एवं राज्य) को 6-14 आयु वर्ग के सभी देशज बच्चों को अनिवार्य रूप में उपलब्ध करा देनी थी- मसलन छात्र-शिक्षक अनुपात, वर्ग कक्ष उपलब्धता, प्रशिक्षित एवं विषयवार शिक्षक, पीने का पानी विद्यालय परिसर एवं खेल का मैदान, शौचालय , बाल पुस्तकालय, पाठ्य-पुस्तक आदि.
संसद द्वारा पारित इस कानून को केन्द्र एवं राज्य सरकारों ने अपने किस दायित्व के रूप में लिया, शायद बहुत कुछ कहने की जरूरत नहीं.

वैसे इस दास्तान को कुछ आंकड़ों से समझना काफी है कि ‘‘इस कानून को लागू होने एवं तीन साल की अवधि बीत जाने के बावजूद आज की तारीख में इन स्कूलों में 12 लाख शिक्षकों की कमी है. अपने प्रदेष बिहार में यह संख्या 2 लाख 60 हजार है. यही नहीं एनसीटीई के मानक के अनुसार बिहार में 1.86 लाख शिक्षक न तो योग्य हैं न ही प्रशिक्षित.

सवाल यह नहीं है कि कानून के प्रावधानों को निर्धारित समयावधि में लागू क्यों नहीं किया गया? सवाल यह नहीं है कि केन्द्र सरकार या राज्य सरकारों को क्या करना था और क्यों नहीं किया?

सवाल दर सवाल

सवाल यह है कि भारतीय लोकतन्त्र का शासक वर्ग या केन्द्र और राज्यों की सरकारें किसकी पक्षधर हैं? यह दल और यह वर्ग किसके प्रति प्रतिबद्ध हैं -एफडीआई या जन के साथ? निजीकरण या सार्वजनीकरण के साथ? बाजार या आम आदमी के साथ?basiceducation

अफसोस का पहलू यह है कि एक कानून (आरटीई) जिससे आने वाले दशकों में देश की तस्वीर बदल सकती थी, देश का सामाजिक ताना-बाना मजबूत हो सकता था, काठयावार से कामरूप तक एक साझी सांस्कृतिक विरासत को खाद-पानी दिया जा सकता था. जिस कानून के सहारे हिन्दुस्तान के नौनिहाल सुदूर इलाकों में शिक्षा रूपी सामाजिक रूपान्तरण की प्रक्रिया से नये हिन्दुस्तान की इबारत लिखने को एक चेता नागरिक बन कर तैयार होते.

एक ऐसे संभावनापूर्ण काननू का केन्द्र और राज्य सरकारों ने अपने साझा प्रयास से शैशव काल में ही हत्या कर डाली.

मतलब साफ है, सिर्फ कानून बना देने से ही सब कुछ ठीक हो जायेगा ऐसा नहीं होता. इसके लिये कानून को लागू करने के लिये चाहिये इच्छा शक्ति, प्रतिबद्धता.

शिक्षा शास्त्री पालो फ्रेररे ने तो यहां तक कहा कि ‘‘शिक्षा पूर्णरूपेण एक राजनैतिक कर्म है देश और काल की जैसी राजनीति होगी देशज शिक्षा भी वैसी ही होगी’’. फ्रेररे के उक्त कथन के संदर्भ में हमे यह बात कबूल करनी चाहिये कि वर्मान भारतीय संदर्भ की राजनीति जन की राजनीति नहीं है, जन पक्षधरता की राजनीति नहीं है. देश का मौजूदा राजनैतिक नेतृत्व या शासक वर्ग उसी के साथ लामबंद होगा, संसाधन उपलब्ध करायेगा जो अंबानी, अजीम प्रेमजी, टाटा या अन्य कार्पोरेट समूह को रास आता हो. पिछले दिनों एफडीआई, निजी विष्वविद्यालय जैसे विषयों पर विमर्श से तो ऐसा ही लगता है.

बाकी है उम्मीद

मगर ऐसा नहीं है कि सब कुछ वैसा ही हो जायेगा जिसका खतरा बनता जा रहा .आज हिन्दुस्तान में लोकतंत्र हैं, नागर समाज है, मानवाधिकार समूह हैं, सामाजिक संगठन हैं, चैथा खम्भा (मिडिया) है. अगर सब मिलकर एक साझी आवाज, प्रतिरोध का स्वर बनते हैं तो सरकारें चाहे केन्द्र की हो या राज्यों की इन दोनों को देशज बच्चों की शिक्षा के लिये जिम्मेदार बनाया हीं जा सकता है.

क्योंकि रास्ता तो इसी कशमकश के बीच ही निकलना है चाहे सरकारें अपने सामाजिक-संवैधानिक सरोकारों के लोक-लाज के कारण निकालें, जिसकी संभावना बाजार शक्तियों के दबाव में कम लगती है. मगर जन दबावों को एक जुट कर शिक्षा अधिकार कानून के ईद-गिर्द एक एकीकृत शैक्षिक आंदोलन खड़ा कर 2014 के लोक सभा चुनाव के समय एक राजनैतिक एजेन्डा तो बनाया ही जा सकता है.

हाँ, एक बात की सनद हो कि एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जो देशो में है और जिसकी जड़ें विगत 50-60 वर्षों में गहरी ही हुईं हैं, में न्याय में विलम्ब या डिनायल एक अच्छे संकेत का परिचायक नहीं. होरी और धनिया के बच्चों को अनिवार्य और निशुल्क शिक्षा मिले जो अब उनका अधिकार है, यह अधिकार उन्हें मिले, उनके साथ न्याय हो.

गालिब से ghalibk.58@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है ghalib

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