इस आईएएस को सलाम,चौटालों की नींद हराम

दिल्ली से रंजना की रिपोर्ट
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और उनके बेटे अजय चौटाला के जेल जाने की कहानी हरियाणा कैडर की आईएएस रजनी शेखरी सिबल के अपमान में छिपी है.

उस दिन अपमान के घूंट पी कर रजनी शेखरी सिबल ने रो दिया था.पर आज चौटाला बंधु सलाखों के पीछे हैं तो शेखरी को अपमान का बदला मिल गया है.आज उन्हें खुशी से ज्यादा अपनी ईमानदारी पर संतोष हो रहा है.

रजनी शेखरी सिबल: जीत ही गई सच्चाई

सन 2000 में जब चौटाला मुख्यमंत्री बने थे तभी जूनियर बेसिक ट्रेनिंग टीचर( जेबीटी) की परीक्षा के बाद 3200 शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी.सिबल तब प्राथमिक शिक्षा विभाग की निदेशक थीं.

सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री के राजनीतीक सलाहकार शेर सिंह बदशामी ने जनवरी 2000 में सिबल से कहा था कि वह रिज्लट की सूची को उनकी इछ्छा के अनूरूप बदल दें.इसके जवाब में 1986 बैच की आईएएस सिबल ने बेबाकी से सिर्फ एख शब्द में जवाब दिया था- “नो”.

बदशामी ने जब यह बात सिबल से कही थी तो वहां मुख्यमंत्री के बेटे अजय चौटाला और एक आईएएस अधिकारी विद्या धर भी मौजूद थे.ट्रीब्यून ने तब चार जनवरी 2003 को इसी मुद्दे पर “एन अनसग हीरोइन” शीर्षक खबर छापी थी.

ट्रीब्यून लिखता है कि बदशामी की बातों से सिबल इतनी आहत हुई थीं कि वह रोने-रोने को हो गई थीं.समझा जाता है कि उसी वक्त बदशामी ने उन्हें यह भी धमकी दी थी कि अब वह एक पल के लिए भी प्राथमिक शिक्षा के निदेशक के पद पर नहीं रह सकतीं. जब सिल को यह आभास हो गया कि अब उन्हें ट्रांस्फर कर दिया जायेगा तो उन्होंने बड़ी दूदर्शिता दिखाते हुए तत्क्षण वास्तविक रिजल्ट की सूची को एक लाल कपड़े में बंद करके, अलमीरा को मुहरबंद करके सील करि दिया था.इतना ही नहीं अलमीरा की चाबियों को भी सील करके उस पर वहां मौजूद अधिकारियों-कर्मचारियों के दस्तखत ले लिए थे.

शाम होते होते गिल का ट्रांस्फर आदेश आ चुका था.और तब 1985 बैच के आईएएस अधिकारी संजीव कुमार को इस विभाग के निदेशक का पद दे दिया गया.

लाल कपड़े में लिपटे इन सबूतों ने आज चौटाला बंधुओं को जेल की सलाखों तक पहुंचा दिया है.उनके साथ 51 अन्य लोग भी हैं जिनमें प्राथमिक शिक्षा के निदेशक व आईएएस संजीव कुमार भी शामिल हैं.

12 साल बाद हई सच्चाई की जीत

अपने अपमान का बदला मिलने और सच्चाई की जीत का जश्न मनाने के लिए रजनी शेखरी सिबल को 12 वर्षों का लम्बा इंतजार करना पड़ा है.पर इस जश्न में सिर्फ रजनी ही अकेली नहीं हैं.इसमें वो सैकड़ों परीक्षार्थी भी शामिल हैं जिनके बदले नाकारे लोगों को शिक्षक बना दिया गया था.

ऐसे दौर में जब आम तौर पर नौकरशाह राजनीतिक नेतृत्व के साथ कदम ताल करके भ्रष्टाचार के सागर में डूबे होते हैं, रजनी शेखरी सिबल ने एक मिसाल कायम की है जिससे यह साबित हुआ है कि ईमानदारी की राह कठिन जरूर होती है पर ईमानदारी का फल तो मिलता ही है.

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