इस दलित अधिकारी के बाग़ी तेवर की ज्वाला को समझिए

इर्शादुल हक–
मध्यप्रदेश कैडर की आईएएस अधिकारी शशि कर्णावत ऐसा अकसर कहती हैं. इस बार फिर उन्होंने ऐसा बयान देकर सनसनी फैला दी है. पर इसबार का उनका बयान निजी व्यथा को बताने के बजाये सार्वजनिक चिंता की नुमाइंदगी करता है.

उन्होंने पिछले दिनों कहा- ‘मुझे उस दिन का इंतजार है जब आरक्षित वर्ग के बहुमत से देश में सरकार बनेगी और वह दिन स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस की तरह लोकतंत्र का तीसरा त्योहार होगा’.

एक नौकरशाह होते हुए कर्णावत ने इस तरह का राजनीतिक बयान भोपाल में बीते रविवार को पिछड़ा वर्ग अधिकारी-कर्मचारी संगठन के संभागीय सम्मेलन में दिया. इसके पहले कई बार कर्णावत यह आरोप लगाती रही हैं कि वह दलित वर्ग से आती हैं इसलिए प्रदेश की सरकार उनका उत्पीड़न और घोर शोषण करती है.

पिछले जनवरी में कर्णावत इतनी व्यथित हो गई थीं कि उन्होंने मुख्यमंत्री को एक पत्र लिख कर कहा था कि उनके खिलाफ एक दशक पहले वित्तीय अनियमितता का मामला दायर किया गया था और उस मामले में उन्हें क्लीन चिट दे दिया गया है फिर भी राज्य सरकार ने उनके ऊपर दायर मामले को अभी तक वापस नहीं लिया है.

वह कहती हैं, यह दलित व महिला अधिकारी का उत्पीड़न और उनके खिलाफ भेदभावपूर्ण रवैया है.

कर्णावत 1999 बैच की मध्यप्रदेश कैडर की अधिकारी हैं और फ़िलहाल तकनीकी शिक्षा विभाग में उपसचिव के पद पर कार्यरत हैं.

दलित आईएएस अधइकारियों की एक बड़ी संख्या है जो समय समय पर आरोप लगाते रहे हैं कि उनके खिलाफ़ विभागी और सररकारी स्तर पर भेदभाव किया जाता है.

इससे पहले दलित समुदाय के एक अन्य आईएएस अधिकारी रमेश थेटे ने एससी-एसटी आयोग के समक्ष अपने खिलाफ हुए भेदभाव की शिकायत दर्ज कराई थी. थेटे ने यहां तक धमकी दी थी कि अगर उनके साथ इंसाफ़ नहीं हुआ तो वह आत्म हत्या तक कर सकते हैं.

शशि कर्णावत और रमेश थेटे दोनों दलित समुदाय के होने के आधार पर जब ऐसे आरोप लगायें तो यह स्थिति भारत के प्रशासनिक तंत्र के लिए चिंता का कारण है.

ऐसे में कर्णावत अगर सार्वजनिक सभा में यह कहती हैं कि वह दिन भारतीय लोकतंत्र का तीसरा सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार होगा जब पिछड़े समुदाय के लोग बहुमत से सरकार बनायेंगे, इसका मतलब साफ़ है कि कर्णावत यह मान कर चल रही हैं की मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में उन्हें इंसाफ़ नहीं मिलने वाला.

एक आईएएस अधिकारी होने के कारण कर्णावत को अपनी प्रशासनिक जिम्मेदारियों और उनके द्वारा बोली गई एक एक बात के महत्व का बख़ूबी एहसास है. उन्हें यह भी बखूबी मालूम है कि इतने बड़े सरकारी ओहदे पर बैठे अधिकारी को अपनी बात कहने कि क्या सीमा होती है. इन सब के बावजूद कर्णावत ने जो बग़ावती लहजा अपनाया है इस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है.

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