उत्तर प्रदेश के अधिकारी नकारे हैं या सरकार?

समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल वर्मा कहते है की उत्तरप्रदेश में काबिल आई.ए.एस अधिकारियुं की काफी किल्लत है. वह कहते हैं की उनके ज्राज्य में सिर्फ उतने ही अधिकारी काबिल हैं जितने की उनके राज्य में जिले हैं. बाकि सब बेकार हैं. इस लिए उनकी सर्कार किसी जिला अधिकारी को उनके पद से हटा नहीं सकती. गोपाल वर्मा का यह सोच उनकी किस क़ाबलियत को दर्शाता है. क्या वर्मा यह कहने की हिम्मत कर सकते हैं की उनकी सर्कार के मंत्री नकारे हैं? उनकी सर्कार में कई ऐसे मंत्री हैं जिनको सर्कार में शामिल हो कर काम करने का अनुभव तक नहीं है. अपनी नकामियुं को छुपाने के लिए ऐसे बयां देकर वर्मा जी खुद को और अपनी सरकार पर लगने वाले आरोपों से बच नहीं सकते.

ये सब को पता है की अगर सर्कार में इछ्शक्ति हो तो वह किसी भी अधिकारी से काम ले सकती है. किसी भी अधिकारी के सहारे कानून का राज कायम कर सकती है. मायावती के कार्यकाल में यही अधिकारी हुआ करते थे और इन्हीं के बल पर उत्तरप्रदेश में क़ानून की स्थिति इस सर्कार की तुलना में कुछ हद तक ठीक हुआ करती थी. पर अचानक सर्कार बदलते ही अधिकारी नाकाबिल कैसे हो गए. क्या इन अधिकारीयों पर सर्कार का नियंत्रण नहीं रहा. या ये अधिकारी सरकार के प्रति जवाब देह नहीं रहे.अगर सर्कार अधिकारीयों को नियंत्रित नहीं करसकती तो उसे अपनी नाकामी को स्वीकार कर लेना चाहिए. और अपनी जवाब देहि को अधिकारीयों के सर पर डालना बंद कर देना चाहिए. अगर सरकार ऐसा नहीं करती तो उसकी परेशानियाँ तो बढेंगी ही बदनामी भी होगी.

अखिलेश को शासन चलाने का कितना अनुभव है ये सभी को पता है. इस लिए निराधार आरोप लगाने के बजाये उनकी पार्टी के जिम्मेदार लीडरों को ऐसी बातों में अपना समय गवाने के बजाये राज्य के शासन तंत्र को दुरुस्त करने की ज़रुरत है.क्यूंकि राज्य की जनता कोई मुलायम सिंह नहीं है कि वह उनकी तरह अखिलेश को दस में से दस अंक दे कर अखिलेश कि नाकामियों को छुपाने की कोशिश करे. वैसे भी अब लोकसभ का चुनाव होने में महज डेढ़ साल ही बचे हैं. ऐसे में उत्तरप्रदेश कि जनता अपना फैसला सुनाने में देर नहीं करेगी

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