उत्तर प्रदेश में बनते बिगड़ते समीकरण और मोदी इफैक्ट

लोकसभा के चुनाव अगले साल होने वाले हैं लेकिन लेकिन उत्तर प्रदेश में माहौल में बदलाव की हवा अभी से दिख रही है. यह साफ़ है कि २०१२ के विधान सभा चुनाव में जिस पार्टी की तरफ जाति बिरादरी का बंधन छोड़कर बड़ी संख्या में लोग थे ,वह पार्टी अब लोकप्रियता के पायदान पर बहुत नीचे है , समाजवादी पार्टी को अपनी जीत को दोहराने के लिए बहुत कुछ करना पडेगा.mulaym.maya

शेषनारायण सिंह

बीजेपी की हालत वैसी ही है जैसी पहले थी यानी बीजेपी के साथ बहुत लोग नहीं नज़र आते . लेकिन नरेंद्र मोदी के नाम आते ही आमतौर पर सुनने को मिल जाता है कि नरेंद्र मोदी को समर्थन तो हम दे रहे हैं लेकिन भाजपा से हमारा कोई लेना देना नहीं है .कांग्रेस का कहीं कोई नामलेवा नहीं है. ग्रामीण समाज के मुखर तबकों में कांग्रेस की बात करने वाला कोई नहीं है . बहुजन समाज पार्टी की बात कभी कोई नहीं करता लेकिन सबको मालूम है कि हर गाँव में हाथी पर वोट डालने वालों की एक निश्चित संख्या है और उसे मायावती के अलावा कोई भी नहीं बदल सकता . हाँ अगर मायावती चाहें तो उनके वोट किसी को भी मिल जायेगें क्योंकि पूरे देश में वोट ट्रांसफर करने वाले नेताओं में केवल मायावती का नाम लिया जा सकता है और किसी का नहीं .

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने आम तौर पर उम्मीदवारों के नामों की घोषणा कर दिया है , इसलिए उत्तर प्रदेश के मध्य और पूर्वी भाग में लगातार चुनाव प्रचार जैसा माहौल नज़र आ रहा है . बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार तो लोकसभा में जीत के सपने लेकर घूम रहे हैं पार्टी के स्थानीय नेता और कार्यकर्ता भी लोकसभा की सीट पर बहनजी का कब्जा सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं . राज्य में समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद विपक्ष में आ गयी बसपा के विधायकों का धंधा पानी भी बंद है . कई नेताओं से बात करके अंदाज़ लगा कि पार्टी को सत्ता में वापस पंहुचाने से ही आम बसपाई की दुकानदारी चलेगी. इसलिए सभी पार्टी की जीत के लिए कोशिश कर रहे हैं . समाजवादी पार्टी में माहौल बिलकुल अलग है .

.समाजवादी पार्टी के कुछ मुकामी और प्रभावशाली नेताओं से बात हुई तो उन्होंने कहा कि करीब सवा साल तक सत्ता में रहने के बाद विधायकों की छवि निहायत ही भ्रष्ट नेता की बन चुकी है ,उनके चमचों के अलावा उनके साथ कोई नहीं है इसलिए अगर विधायक जी मुखालफत कर रहे हैं तो उससे उनकी पार्टी के लोकसभा उम्मीदवार को फायदा होगा .

समकालीन इतिहास का मामूली जानकार भी बता देगा कि सामूहिक लाभ पंहुचाने की राजनीति से दूरगामी लाभ होता है जबकि व्यक्तिगत रूप से वोटर को लाभ पंहुचाने की रणनीति के बाद पार्टी कमज़ोर होती है . अगर इतना सटीक उदाहरण मौजूद था तो समाजवादी पार्टी ने लैपटाप वाली संस्कृति को क्यों आगे बढ़ाया , यह समझ से परे है. सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने ताज़ा फैसले में साफ़ कह दिया है कि लोगों को व्यक्तिगत लाभ पंहुचाने की कोशिश करना और उनको मुफ्त में तोहफे बांटना लोक प्रतिनिधित्व कानून ( १९५१) की धारा १२३ के तहत भ्रष्ट आचरण नहीं माना जा सकता लेकिन मुफ्त तोहफों के कारण लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ें कमज़ोर होती हैं .

कानून व्यवस्था

लैपटाप वितरण के कारण समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है .यह एक बड़ी समस्या है लेकिन कानून व्यवस्था की खराब हालत सबसे बड़ी मुसीबत है . मायावती की सरकार के दौरान भी उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था बहुत खराब थी लेकिन पिछले सवा साल में तो हालात इतने खराब हो गए हैं कि लगता है कि पुलिस नाम की कोई संस्था ही नहीं है . मुकामी समाजवादी नेता ही सारे झगड़े निपटा रहे हैं ,सारी पंचायतें कर रहे हैं , दरोगा लोग अपनी पहल पर कुछ नहीं कर रहे हैं . सत्ताधारी पार्टी के मुकामी नेताओं को फिट करके वे अपनी कुर्सी पर जमे रहने को ही नौकरी का उद्देश्य मान रहे हैं . दरोगाओं को भी लखनऊ जाकर यह देखने का मौक़ा मिलता रहता है कि उनका मुकामी नेता राजधानी में किसी ताक़तवर नेता के यहाँ पैठ रखता है. पुलिस में विधायकों की बहुत चलती है . अगर किसी मामले में उनकी रूचि है तो आम तौर पर दरोगाजी उस काम को प्राथमिकता पर करते हैं . यहाँ गौर करने की बात यह है कि पुलिस में सिफारिश करने वाले यह मुकामी नेता या विधायक कानून व्यवस्था के सुधार से सम्बंधित कोई सिफारिश नहीं कर रहे होते हैं . यह लोग किसी अपराधी को बचाने के लिए ही कोशिश कर रहे होते हैं क्योंकि पैसा तो वहीं मिलता है .

समाजवादी पार्टी के उम्मीदवारों के सामने एक और बड़ी समस्या बिजली सप्लाई की खस्ता हालत है. इलाके में उनका निकल पड़ना दूभर हो रहा है क्योंकि जहां भी जाते हैं लोग बिजली के बारे में सवाल उठाते हैं . इन सवालों का जवाब किसी के पास नहीं है क्योंकि बिजली विभाग के इंजीनियर तो लखनऊ में सेटिंग रखते हैं जबकि लाइनमैन वगैरह स्थानीय विधायक के साथ फिट रहते हैं . जानकार बताते हैं कि अगर बिजली की सप्लाई ठीक न हुई तो सत्ताधारी पार्टी के लिए भारी मुसीबत बन जायेगी.

भारतीय जनता पार्टी ने यह प्रचार कर रखा है कि नरेंद्र मोदी के आते ही बिजली की सप्लाई सही हो जायेगी क्योंकि गुजरात में बिजली के स्थिति बहुत अच्छी है . किसी को गुजरात का सच मालूम नहीं है लेकिन उत्तर प्रदेश के मौजूदा हालात में यह एक ऐसी बात है जो असर कर सकती है. उत्तर प्रदेश में चौराहों पर माहौल बनाने वाली जातियों के लोग नरेंद्र मोदी के साथ इसलिए लग गए हैं कि उनको उम्मीद है कि मोदी गुजरात की तरह ही मुसलमानों को मारपीट कर सही कर देगें . अवध इलाके के एक उम्मीदवार ने बताया कि उनके इलाके में चौराहे का मालिक ठाकुर होता है और फिलहाल ठाकुर बिरादरी के कुछ उत्साही लोग मोदी के साथ हैं. ब्राहमणों और व्यापारियों में भी मोदी का प्रचार अच्छा है लेकिन सब जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में सत्ता इन जातियों के वोट से नहीं आती . सत्ता मुसलमानों , दलितों और पिछड़ी जातियों के वोट से मिलती है . अगर कोई भी पार्टी इन जातियों को एकजुट करने में सफल हो गयी तो लोकसभा में उसी का पलड़ा भारी होगा . हालांकि यह बात पक्की है कि नरेंद्र मोदी की हवा चौराहों पर तो रहेगी , लेकिन बूथों पर राज मतदाता का होगा और उसी की कृपा से उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली की सत्ता का जुगत बनेगी.

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