उम्मीदों का चिराग़

पटना की कोचिंगों के बाजार की दुनिया अजीब है, सैकड़ों शिक्षक और हजारों छात्रों में ज्यादातर नाकारे हैं- छात्र भी और शिक्षक भी. एक लूटने में लगा है तो दूसरा लुट जाने को बेताब है. लेकिन फिर भी कुछ शिक्षक उम्मीद का चिराग जलाने में लगे हैं.

विकास राही और उनके प्रशिक्षित शिक्षकों की टीम

विकास राही और उनके प्रशिक्षित शिक्षकों की टीम

नौकरशाही डेस्क

इस कड़वी सच्चाई को कोई और नहीं जब खुद एक शिक्षक स्वीकारे तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए. विकास राही पटना की कोचिंग की दुनिया का एक पहचाना नाम है, जो सच स्वीकारने का हौसला रखते हैं. वह स्वीकार करते हैं कि कोचिंग की दुनिया में सब कुछ सामान्य नहीं चल रहा. कारण यह कि कोचिंग कारोबार का रूप ले चुका है जिनका बड़ा मकसद पैसे बनाना रह गया है.

 गुणवत्ता का सवाल

जब शिक्षा का उद्देश्य पैसे बनाना रह जाये तो शिक्षा की गुणवत्ता पीछे छूट जाना स्वाभाविक है. एक सचेत और समाज के प्रति जवाबदेही की भावना रखने वाला शिक्षक जब मेडिकल-इंजिनियिरिंग के कोचिंग व्यवसाय के अंदर की खामियों को महसूस करता है तो इन खामियों को दूर करने का साहस भी दिखाता है. विकास राही पिछले एक दशक से इन खमियों पर गौर करते रहे हैं. इसके बाद उन्होंने पढ़ाई के साथ अपने सिर पर एक नयी जिम्मेदारी भी ले रखी है. यह जिम्मेदारी है इंजिनियरिंग और मेडिकल के छात्रों के लिये योग्य और समर्पित शिक्षकों का प्रशिक्षण करना.

राही बताते हैं कि पटना समेत बिहार में मेडिकल-इनजिनियरिंग की कोचिंग कराने योग्य शिक्षकों की भारी कमी है. नतीजा यह है कि छात्र बड़े पैमाने पर ठगी के शिकार हो रहे हैं. छात्र संचार माध्यमों के प्रचार और चमक दमक के आगे कोचिंग संस्थानों में मोटी फीस देकर पढ़ने तो पहुंच जाते हैं पर कुछ ही दिनों में वे अपने शिक्षकों के पारफर्मेंस से नाउम्मीद हो जाते हैं लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है. इस गंभीर समस्या से मुक्ति के लिए विकास राही ने पिछले सात वर्षों से कोचिंग करने योग्य शिक्षकों के प्रशिक्षण का बीड़ा उठा रखा है. वह मानते हैं कि योग्य शिक्षक ही छात्रों की योग्यता को निखार सकते हैं.

Concepts of functions and Calculus ( टाटा मैक्ग्रोहिल) और  Concept of Algebra for the JEE, Men and Advance,( पियरसन प्ब्लिकेशन्स) के लेखक विकास राही बताते हैं कि बिहार में लाखों छात्र मेडिकल और इंजिनियिरिंग की कोचिंग करते हैं लेकिन उनके लिये योग्य शिक्षकों की भारी कमी है. वह इसका कारण गिनाते हुए बताते हैं कि योग्य और मेहनती लोग डाक्टर, इंजिनियर, आईएएस और दूसरे जॉब्स को प्राथमिकता देते हैं और आम तौर पर असफल बचे लोग कोचिंग में शिक्षण के काम में लग जाते हैं. जिसका असर नयी पीढ़ी के छात्रों पर पड़ता है. राही बताते हैं कि शिक्षण कार्य से पैसे बनाना बुरा नहीं है पर हमारी यह भी जिम्मेदारी है कि हम समाज को अच्छे और योग्य शिक्ष उपलब्द करायें. इसी लिए हम शिक्षक प्रशिक्षण के कार्य में लगे हैं.

 

प्रशिक्षण का एक भी संस्थान नहीं

राही कहते हैं कि देश में सामान्य शिक्षा के लिए तो शिक्षक प्रशिक्षण के सैकड़ों मान्यता प्राप्त संस्थान हैं पर इंजिनियरिंग-मेडिकल कालेजों में नामांकन की तैयारी के लिए घोषित तौर पर एक भी संस्थान नहीं है. 11वी और 12वीं कक्षा की पढ़ाई कराने के लिए स्कूलों में शिक्षक तो हैं पर उनसे कम्पिटिशन की तैयारी का काम इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि सेलेबस एक जैसा होने के बावजूद दोनों की परीक्षा के स्तर में काफी अंतर है. राही कहते हैं इसी उद्देश्य को सामने रख कर हमने कोचिंग के योग्य शिक्षकों का प्रशिक्षण शुरू किया है.

पिछले सात वर्षों में विकास राही की कोचिंग संस्तान ने 25-30 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया है जो पटना, रांची, मुजफ्फरपुर समेत अनेक शहरों में पढ़ाने में जुटे हैं. उनके द्वारा प्रशिक्षत शिक्षकों में वसंत गिरी, राकेश कुमार और राज कुमार सरीखे अनेक शिक्षक अलग-अलग शहरों में शिक्षण कार्य में लगे हैं.

क्यों है प्रशिक्षित शिक्षकों की जररत

यह सच है कि 11वीं और 12वीं कक्षा के सेलेबस पर बेस्ड ही इंजिनियरिंग और मेडिकल की परीक्षा होती है पर दोनों परीक्षाओं के स्टेंडर में भारी फर्क है. राही बताते हैं कि आईआईटी और सीबीएससी मेडिकल में नामांकन के लिए उच्च स्तर की परीक्षा होती है. ऐसे में उस स्तर को मेनटेन करने के लिए प्रशिक्षत टीचर जरूरी हैं. वह बताते हैं कि शिक्षकों की भारी कमी के कारण छात्रों को काफी नुकसान उठाना पड़ता है. इसी खाई को पाटने के लिए हम शिक्षकों के प्रशिक्षण पर जोर देते हैं.

अयोग्य छात्र भी हैं जिम्मेदार

राही बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में छात्रों में इंजिनियर और डॉक्टर बनने की जिज्ञासा तो काफी बढ़ी है लेकिन खुद छात्रों की बड़ी संख्या इस योग्य नहीं होती कि वे कम्पिटिशन में कम्पीट कर सकें. ऐसे में कोचिंग केंद्रों की यह जिम्मेदारी बनती है कि वे छात्रों की योग्यता तय करें और कम योग्य छात्रों को यह बतायें कि वे या तो अपनी तैयारी पूरी करें या फिर वह किसी अन्य क्षेत्र में प्रयास करें.

लेकिन यह दुर्भाग्य है कि शिक्षा के बाजारीकरण के दौर में कोचिंग कराने वाले ये रिस्क नहीं उठाते. लेकिन राही अब इस बिंदु पर भी सोच रहे हैं. वह कहते हैं कि छात्रों के भविष्य के लिए इस मुद्दे पर सोचने की जरूरत है. राही बताते हैं कि उनके संस्तान ने इस दिशा में काम करना शुरू कर दिया है.

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