उर्दू पर सितम ढाकर ग़ालिब पर करम क्यों है?

प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष जस्टिस मार्कण्डेय काटजू उर्दू भाषा के प्रति भारत मे होने वाले सौतेल व्यवहार पर अकसर चिंता जताते रहे हैं.Mirza-Ghalib-640x480

सोशल मीडिया पर काटजू ने  उर्दू के दो मशहूर शायरों- मिर्जा गालिब और साहिर लुधियानवी को याद किया है.

गौरतलब है कि मार्कंणडेय काटजू उर्दू क महान शायर गालिब को भारत रत्न से सम्मानित करने की वकाल भी करते रहे हैं.

उन्होंने भारत में उर्दू के खिलाफ पेश आने वाले रवैये पर साहिर की एक नज्म पोस्ट की है.

 

1969 में आगरा में ग़ालिब की देहांत शताब्दी समारोह जश्न-ए-ग़ालिब में साहिर लुधियानावी की पंक्तियां थीं-

“जिन शहरों में गूंजी थी ग़ालिब की नवा बरसों,

उन शहरों में अब उर्दू बेनाम-ओ-निशाँ ठहरी।

आज़ादी-ए-कामिल का ऐलान हुआ जिस दिन,

मातूब जुबां ठहरी, ग़द्दार ज़ुबाह ठहरी।।”

 

”जिस अहद-ए-सियासत ने यह ज़िंदा जुबां कुचली

उस अहद-ए-सियासत को महरूमों का ग़म क्यों है?

ग़ालिब जिसे कहते हैं उर्दू का ही शायर था,

उर्दू पर सितम ढाकर ग़ालिब पर करम क्यों है?”

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