ऊंची रिश्वत…महंगी ज़मीन

वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेश्वर बिहार में रिश्वतखोरी की बढ़ती दर के तार पटना में महंगी होती जमीन के भाव से जोड़ते हैं. वह बता रहे हैं कि बाबुओं और नेताओं ने नौकरीपेशा लोगों को दोगज जमीन का सपना देखने लायक भी नहीं छोड़ा है.

दस करोड़ का डीआईजी…….बहस के कोण कई हैं. ग्रैंड फिनाले की रफ्तार धीमी है. प्रक्रियाओं का हवाला है. फिक्रमंदों का असर भी है. अंत तक बचेंगे,लगता नहीं. बच गये,तो अभयानंद की भद पीट जाएगी.

पुलिस मुख्‍यालय बोल चुका है कि लगे आरोपों में दम है.बैक टू जम्‍मू-कश्‍मीर भर से बात बनने से रही.

देश भर में चर्चा है कि पटना बहुत महंगा हो गया. अपनी श्रेणी के शहरों में टाप के पायदान पर है. लेकिन यह महंगाई आई कहां से ? बहुत सारे कल-कारखाने नहीं खुले हैं.बड़े कारखानों के आने की आहट भी नहीं है.प्रति व्‍यक्ति आय ने भी आसमान को नहीं छुआ. लेकिन राजधानी में जमीन का भाव अब करोड़ों में है,तंग गलियों में भी पचास लाख से कम की कोई बात नहीं करता.

नौकरीपेशा लोग जमीन खरीदने का सपना भी नहीं देख सकते. हां,गुजर-बसर को एक फ्लैट हो,ख्‍वाहिश रहती है.जमीन के भाव बढ़े,तो फ्लैट का मूल्‍य भी बढ़ गया. लेकिन बड़ा सवाल यह कि जमीन की कीमत इतनी बढ़ी कैसे? राजधानी के विकास का कोई रोडमैप भी नहीं बना,बावजूद तीस किलोमीटर इर्द-गिर्द कीमतें नित्‍य नये रिकार्ड बनाती चली गई.

सभी पूछते हैं,आखिर इतना पैसा आ कहां से रहा है. कुछ लोग कहेंगे,बिहार में बसने लायक इकलौता शहर पटना है,जहां बिजली/सुविधाएं है. ऐसे में,दूसरे शहरों व प्रदेशों में रहकर धन कमा रहे लोग पटना में एक घर की हसरत जरुर रखते हैं. सो,इनकी डिमांड ने कीमत बढ़ा दी .तर्क से कुछ हद तक मैं सहमत भी हूं. लेकिन मेरी राय में ऐसे अधिसंख्‍य लोग निवेश फ्लैट में कर रहे हैं,ना कि जमीन में.

अप्रवासी बिहारी बेहतर जानते हैं कि अपने सूबे में जमीन को ताकते रहना कितना कठिन टास्‍क है ।

फिर वही सवाल,तब दिन दुनी-रात चौगुनी पटना के तीस-चालीस किलोमीटर की सर्किल में जमीन के भाव बढ़ा कौन रहा है. कीमतें दूसरे शहरों में भी बढ़ी है,लेकिन पटना की स्‍पीड में नहीं. कारणों को जानना हो,तो किसी ब्रोकर के साथ सर्किल का चक्‍कर लगायें. जमीन के बड़े पट्टों की घेराबंदी देखने को मिलेगी. ब्रोकर आपको बताता चलेगा कि यह फलां ‘बाबू’ की है,तो यह फलां ‘जी’ की. नाम सुन-सुन कर आप आगे बढ़ते चले जायेंगे .केवल खाकी और खादी वाले नहीं हैं,सभी तरह के ‘बाबू’ मिलेंगे,जिनकी आंखों और दस्‍तखत को ताकत मिली हुई है.

विवादित जमीन भी बिकने को सबसे पहले इनके पास ही आती है.दूसरी बात महत्‍वपूर्ण यह कि इनमें से किसी भी पट्टे के दस्‍तावेज पर आपको ‘बाबू’ और ‘जी’ लोग के नाम नहीं मिलेंगे. दस्‍तावेज दूसरों के नाम होते हैं. खास वजह कि ‘बाबू’ लोगों को साल के अंत में संपत्ति की घोषणा जो करनी होती है. इसे तो आप बुरबकई कहें कि दस करोड़ का राज खुल गया ,वरना डकार जाने वाले तो कई बैठे हैं. कोई दो साल पहले ही महत्‍वपूर्ण पोस्टिंग के बाद अनमने भाव से अपने काडर में वापस भेजे गये हाकिम का ‘राज’ तो सभी जान गये थे .जमीन इतनी अर्जित कर ली कि कई पुश्‍तों का काम चल जाए.

एक चर्चित हाकिम ऐसे भी

एक चर्चित हाकिम का किस्‍सा भी जानने लायक है.पटना-मसौढ़ी के भीतरी इलाके में कई एकड़ जमीन खरीदी.खरीदगी के कुछ माह बाद ही नया सर्किल रेट आया. जहां जमीन ली थी,सर्किल रेट बाजार मूल्‍य से भी अधिक कर दी गई. लोगों ने राज को बाद में समझा.उधर सड़क -निर्माण को एनएचएआई को भूमि का अधिग्रहण करना था. अधिग्रहण में मुआवजे का भुगतान न्‍यूनतम सर्किल रेट से करने का नियम है.

एक और नया फैशन है. जिनके पिताजी ने जीते जी कुछ अर्जित नहीं किया,उनके बेटे ‘बाबू’ और ‘जी’ बनते ही पिताजी के नामपट्ट वाले बड़े बंगले बनाने लगे हैं. पता नहीं,इसके पीछे आयकर की कुछ बारीकियां हैं. ‘बाबुओं’ की इस कतार की कंपनी में एक-दो वैसे लोग भी आपको अवश्‍य मिलेंगे,जो धंधे से ब्‍लैक को व्‍हाइट करने का मंत्र जानते हैं.

आप शायद जानते भी हों,दीघा रेल ब्रिज का किस्‍सा. गंगा पार की बहुत सारी जमीन महीने भर में बिक गई थी. किसान अनुमान लगा ही नहीं पा रहे थे कि पटना के बाबू लोग रोज जमीन की नई कीमत देने को क्‍यों तैयार हैं. जब सब बिक गई,तो माजरा समझ में आया. दनियावां में भी कुछ ऐसा ही हुआ .बताने की जरुरत तो अब रही नहीं कि लाख…….करोड़ का निवेश ‘बाबू’ और ‘जी’ लोग सबसे अधिक जमीन में ही करते हैं और इस तरह पटना देश की नजरों में महंगा होता चला जा रहा है.

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