एक्सक्लुसिव: ‘हिंदुस्तान’ के विज्ञापन में दो करोड़ की कटौती

नौकरशाही डॉट इन को पता चला है कि वर्ष 2012-13 में दैनिक हिंदुस्तान को मिलने वाले सरकारी विज्ञापन में 2 करोड़ रुपये की कमी आई है. इसे सामाजिक आंदोलनों के प्रभाव का नतीजा माना जा रहा है.

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

पिछले वर्ष इस अखबार को जहां 12 करोड़ रुपये से ज्यादा के सरकारी विज्ञापन मिले थे वह इस साल घट कर 10 करोड़ रुपये रह गये हैं. विज्ञापन की दरियादिली के मामले में अब बिहार सरकार का सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग की भी बोलती बंद होती जा रही है.

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‘जागरण’ भी है विज्ञापन लूट का गुनाहगार

ताजा आंकड़ों (जिसकी कॉपी नौकरशाही डॉट इन के पास उपलब्ध है) से पता चला है कि बिहार का सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग ने विज्ञापन रूपी थैली खोलने के पहले अब कई बार सोचने लगा है. क्योंकि पिछले दो सालों में सामाजिक आंदोलनों और आरटीआई कार्यकर्ताओं की बढ़ी सक्रियता के चलते सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग भी भयभीत है और विज्ञापनों की बरसात करने के पहले उसे कई बार सोचना पड़ रहा

राज्य सरकार की विज्ञापन निति के अनुसार किसी अखबार के विज्ञापन की दर और विज्ञापन देने की सरकार की प्राथमिकता किसी अखबार की प्रसार संख्या के आधार पर तय होती है. इन बातों का ख्याल रखते हुए ही सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग विज्ञापन जारी करता है. लेकिन हैरत में डाल देने वाली बात यह है कि हाल ही में एक लिखित आवेदन देकर जब विभाग से पूछा गया कि हिंदुस्तान की प्रसार संख्या क्या है तो इसके जवाब में सूचना एंव जनसम्पर्क विभाग ने कहा कि उसे इसकी जानकारी नहीं है.

इस विभाग का यह जवाब खुद उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करता है.

पिछले पांच-छह सालों में बिहार में सरकारी विज्ञापनों की बरसात से राज्य के अखबार मालामाल होते रहे हैं. जिसके बदले अखबारी घरानों पर सरकारी मुख्यपत्र होने जैसे गंभीर आरोप लगते रहे हैं. कई मामले में तो यहां तक बातें सामने आ चुकी हैं कि हिंदुस्तान और दैनिक जागरण जैसे अखबार आरएनआई नियमों का घोर उल्लंघन कर के कई सौ करोड़ रुपेय के विज्ञापन लूट को अंजाम दे चुके हैं.

पिछले हफ्ते प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में इस विज्ञापन घोटाले का उल्लेख किया गया है.

सामजिक कार्यकर्ता शिव प्रकाश राय का कहना है कि मौजूदा सरकार विज्ञापन देने के मामले में पारदर्शिता नहीं बरतती जिसके कारण विज्ञापन नियमों का घोर उल्लंघन हो रहा है.

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