एडिटोरियल कमेंट: अनंत के बाद अब सुनील पर सुलगेगी राजनीति

अनंत सिंह की गिरफ्तारी के एक पखवारे बाद जद यू विधायक सुनील पांडये सलाखों में डाल दिये गये. ‘कानून अपना काम’ कर रहा है पर राजनीति किस दिशा में जा रही है? sunil.pandey

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

शुक्रवार का दिन छोटे भाई  हुलास पांडेय के लिए विधान परिषद की चुनावी हार बुरी खबर ले कर आया और शनिवार बड़े  भाई सुनील पांडेय को सलाखों तक पहुंचा गया.

सुनील और हुलास पांडेय बड़े-छोटे भाई हैं. भोजपुर में हुलास के समर्थक अपनी हार के गम को भुला भी नहीं पाये थे कि महज 24 घंटे बाद सुनील पांडे हिरासत में लिए गये और शाम होते-होते आरा जेल भेज दिये गये. सुनील पर कोई पंद्रह दिन पहले, लम्बू शर्मा नामक एक भगोड़े ने संगीन आरोप लगाये थे. लम्बू ने दिल्ली पुलिस को इकबालिया बयान में कहा था कि यह सुनील पांडे थे जिन्होंने उसे 23 जनवरी 2015 को आरा कोर्ट परिसर में हुए बम धमाकों के बाद भागने और शरण देने में मदद की थी. याद रहे कि लम्बू शर्मा की कोर्ट में पेशी होनी थी. जैसे ही उसको लेकर पुलिस वैन कोर्ट परिसर में पहुंचा, एक भयानक विस्फोट हुआ. चारों तरफ धुँआ फैला. एक पुलिसकर्मी और एक महिला की मौत हुई और लम्बू शर्मा फरार हो गया.

आरा कोर्ट ब्लास्ट

यह भी याद रहे कि 24 जून को शाम पांच बज कर 3 मिनट पर आरा के एसपी नवीन चंद्र झा ने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर अपडेट करते हुए लिखा कि आरा कोर्ट विस्फोट का आरोपी लम्बू शर्मा गिरफ्तार कर लिया गया है. अब तक इस मामले में 9 लोगों को अरेस्ट किया जा चुका है. अगर सुनील पांडेय की गिरफ्तारी को जोड़ लें तो अब तक इस मामले में 10 लोग अरेस्ट हो चुके हैं.

ध्यान देने की बात है कि सुनील पांडेय जद यू के विधायक हैं. कल तक उनके छोटे भाई हुलास पांडे भी जद यू के ही विधायक हुआ करते थे. लेकिन विधान परिषद चुनाव में हुलास को जद यू ने टिकट से वंचित कर दिया. वह ताव में आ गये और लोजपा के टिकट से लड़ गये. यहां से राजद के राधा चरण सेठ जीते हैं.

पांडेय भाइयों पर ग्रह

लोग सवाल उठा रहे हैं कि पांडेय भाइयों के लिए अचानक चीजें कैसे उलट पलट गयीं. जिस जनता परिवार में कल तक दोनों की अच्छी-खासी पहचान थी, अचानक यह क्या हो गया. हालांकि सच यह भी है कि हुलास और सुनील पांडेय की गितनी बाहुबली विधायक के रूप में रही है. दोनों भाइयों के ऊपर अनेक मामले दर्ज हैं. दोनों भाई कई मामले में बरी भी हो गये हैं. लेकिन यह भी सच है कि एक पखवारा पहले जैसे ही सुनील पांडेय पर लम्बू शर्मा ने यह आरोप लगाया कि उसे सुनील पांडेय ने आरा ब्लास्ट के बाद भागने में मदद की तो, कुछ लोग यह मानने लगे थे कि आज नहीं तो कल सुनील पांडेय की भी गिरफ्तारी संभव है.

हालांकि सुनील पांडेय खुद को इस मामले में निर्दोश करार दे रहे थे. सूत्र बताते हैं कि उन्होंने सरकार से ले कर पुलिस के आला हुक्काम तक यह बात रखी थी कि उनकी जिस तरह से चाहें जांच कर लें. चाहे तो नार्को टेस्ट कर लें. वह निर्दोष हैं. लेकिन आरा पुलिस यह कह रही है कि सुनील के खिलाफ पर्याप्त सुबूत भी हैं.

कोई एक पखवारा पहले जद यू के ही विधायक अनंत सिंह की गिरफ्तारी के बाद, सुनील पांडेय दूसरे विधायक हैं जिन्हें सलाखों के भीतर डाला गया है. कुछ लोग यह  आरोप लगा रहे हैं कि एक खास सामाजिक पृष्ठभूमि के होने के कारण दोनों विधायकों को फंसाया गया है. अनंत की गरिफ्तारी के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा था कि कानून अपना काम करेगा. स्वाभाविक है कि सुनील पांडेय की गिरफ्तारी के बाद भी वह ऐसी ही प्रतिक्रिया देंगे. सवाल यह भी है कि क्या आपराधिक पृष्ठभूमि के विधायकों पर कानूनी पकड़ नहीं होनी चाहिए? अगर सुनील निर्दोष हैं तो उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी.

 जातीय गोलबंदी

अगले कुछ महीने में बिहार विधान सभा चुनाव का गावाह बनेगा. इतना तो तय है कि सुनील और अनंत की गिरफ्तारी का कानूनी पक्ष जो भी हो, कुछ लोग इसे राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं. इसकी शुरूआत राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष अरूण कुमार ने कर भी दी है. उन्होंने अनंत की गिरफ्तारी के बाद यहां तक कहा कि उनके समाज ने चूड़ियां नहीं पहन रखी है. वह नीतीश कुमार का कलेजा तोड़ देगा.

अरूण कुमार के इस बयान ने स्प्ष्ट कर दिया कि अनंत और सुनील की गिरफ्तारी को जहां उनके समर्थक जातीय राजनीति और मोर्चाबंदी के तौर पर ले रहे हैं वहीं सुनील-अनंत के विरोधी भी यही चाह रहे हैं कि मामला इसी दिशा में आगे बढ़े.

बिहार की राजनीत एक बार फिर संवेदनशील मोड़ पर पहुंचती जा रही है.

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