एडिटोरियल कमेंट: केरल में अपमानित हुई CBI क्या सृजन घोटाले की ईमानदारी से जांच करेगी?

केंद्र द्वारा सृजन घोटाले की जांच सीबीआई से कराने के फैसले के कुछ देर पहले ही, सीबीआई केरल हाईकोर्ट में अपमानित हो रही थी क्योंकि 370 करोड़ रुपये के घोटाला मामले में उसने  मुख्यमंत्री को झूठा फंसा दिया था. ऐसे में सृजन घोटाले पर उससे क्या उम्मीद की जाये?

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

 

केरल हाईकोर्ट ने केरल के मुख्यमंत्री व सीपीएम के कद्दावर नेता पिनाराई विजयन को इस घोटाले में क्लीन चिट दी. और सीबीआई को जलील करते हुए यहां तक कह डाला कि उसने जानबूझ कर विजयन को घसीटा, जबकि उसके पास कोई साक्ष्य तक नहीं था.

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जब केरल का हाईकोर्ट यह फैसला सुना रहा था लगभग उसी समय केंद्र सरकार ने बिहार के सृजन घोटाले की जांच सीबीआई को सौंपने का ऐलान कर रही थी. यह हमारा दुर्भाग्य है कि सीबीआई एक बदनाम एजेंसी है जिसे केंद्र द्वारा मिसयूज करने के दर्जनों प्रमाण हैं, पर सच्चाई यह भी है कि इसके सिवा कोई और एजेंसी भी नहीं जो इस तरह के बड़े घोटाले की जांच कर सके.

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बिहार के सृजन घोटाले का आकार एक हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का आंकड़ा पार गया है. अभी तक जो साक्ष्य मिले हैं उसे पता चलता है कि इस घोटाले की नीव 2004 में पड़ चुकी थी. भागलपुर के तत्कालीन डीएम केपी रमैया की एक चिट्ठि नौकरशाही डॉट कॉम ने पहले ही सावर्जनिक कर दी है. जिसमें उन्होंने अपने मातहतों को लिखा था कि सरकार के पैसे सृजन के अकाउंट में जमा किया जा सकता है.

बड़े बड़ों का हाथ

अभी तक जो प्रमाण सामने आये हैं उससे साफ है कि  भाजपा के गोड्डा के सांसद निशिकांत दुबे की जमीन पर मॉल बनाने वाली कम्पनी जीटीएम के अकाउंट में भी सृजन ने पैसे ट्रांस्फर किये. इसके अलावा भागलपुर के जिला जदयू के अध्यक्ष शिव कुमार मंडल का भी प्रोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से नाम इस मामले में आ चुका है. अनेक आईएएस अफसर, बिहार प्रशासनिक सेवा के अनेक अधिकारी व कर्मी इस घोटाले की जद में हैं. भाजपा के अनेक दिग्गजों तक इस घोटाले की आंच पहुंच सकती है. केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह, शाहनवाज हुसैन की तस्वीरें सृजन के अनेक फंक्शन्स में सामने आ चुकी हैं.

 

इस घोटाले के तार राजद के नेताओं से जुड़े हैं कि नहीं, इसकी जानकारी अभी तक सामने नहीं आयी है. अगर आ जाये तो कोई अचरज की बात नहीं होगी. देश यह जानना ही नहीं चाहता, बल्कि यह चाहता है कि असली घोटालेबाज पकड़े जायें, उन्हें सजा मिले. लेकिन लाख टके का सवाल यह है कि क्या सीबीआई इस मामले में ईमानदारी से काम कर पायेगी? खास तौर पर तब जब इस एजेंसी पर सुप्रीम कोर्ट तक ने टिप्पणी करते हुए कह रखा है कि यह केंद्र सरकार का तोता है. यह सवाल तब और मौजू हो जाता है जब बिहार और दिल्ली दोनों जगहों पर एक ही गठबंधन सरकार में हों. ऐसे में यह मांग स्वाभाविक भी है कि सीबीआई जांच सुप्रीम कोर्ट के किसी जज की निगरानी में कराई जाये.

हालांकि सीबीआई ने अनेक जांच बड़ी ईमानदारी से की है, ऐसी भी मिसालें हैं. ऐसे में देखना है कि सीबीआई सृजन घोटाले पर किस नतीजे तक पहुंचती है.

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