औरंगाबाद: कौन धराशायी करेगा चितौड़गढ़ का ‘किला’ 

मगध का सबसे संवेदनशील क्षेत्र रहा है औरंगाबाद। नक्सली हिंसा के लिए बदनाम रहा है यह जिला। नक्सली आंदोलन से सामाजिक बदलाव की हवा भी चली और देखते ही देखते चितौड़गढ़ का किला दरकने लगा। अनुग्रह नारायण सिंह के प्रभाव वाले इस संसदीय क्षेत्र से उनके पुत्र सत्येंद्र नारायण सिंह यानी छोटे साहब कई बार संसद के लिए निर्वाचित हुए। उनकी यह पारिवारिक सीट मान ली गयी थी। 1989 में छोटे साहब बिहार के मुख्यमंत्री थे और उनके ही मुख्यमंत्रित्व काल में 1989 का लोकसभा चुनाव हुआ। इस चुनाव में उनकी पुत्रवधू श्यामा सिन्हा कांग्रेस की उम्मीदवार थीं। इस चुनाव में उन्हें जनता दल के रामनरेश सिंह ने पराजित किय था। यह हार छोटे साहब की राजनीति के साथ ही बिहार की राजपूत राजनीति को भी प्रभावित किया। औरंगाबाद राजपूत प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता था। राजपूत प्रभाव के कारण इसे चितौड़गढ़ भी कहा जाता है। उसके पर्याय सत्येंद्र नारायण सिंह थे। 1989 में छोटे साहब की पुत्रवधू की हार से चितौड़गढ़ का किला दरक गया था। लेकिन इस सीट पर राजपूतों का कब्जा बरकरार रहा। परिसीमन के बाद भी दो चुनाव हुआ और दोनों बार राजपूत सुशील कुमार सिंह चुनाव जीतते रहे।

वीरेंद्र यादव के साथ लोकसभा का रणक्षेत्र – 1
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सांसद — सुशील सिंह — भाजपा — राजपूत
विधान सभा क्षेत्र — विधायक — पार्टी — जाति
औरंगाबाद — आनंद शंकर — कांग्रेस — राजपूत
कुटुंबा — राजेश राम — कांग्रेस — रविदास
रफीगंज — अशोक सिंह — जदयू — राजपूत
इमामगंज — जीतनराम मांझी — हम — मुसहर
टेकारी — अभय कुशवाहा — जदयू — कुशवाहा
गुरुआ — राजीव नंदन — भाजपा — दांगी
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औरंगाबाद में अब यही सवाल पूछा जा रहा है कि चितौड़गढ़ का किला ध्वस्त हो पाएगा। यानी औरंगाबाद ‘राजपूत मुक्त’ हो पाएगा। 2009 के पहले इस सीट से दोनों प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवार राजपूत जाति के ही होते थे। पहली बार 2009 में जदयू के राजपूत उम्मीदवार सुशील सिंह के खिलाफ राजद ने शकील अहमद खान को अपना उम्मीदवार बनाया था। कांग्रेस के उम्मीदवार निखिल कुमार बनाये गये थे। 2014 के चुनाव में सुशील सिंह भाजपा में शामिल हो गये थे और जदयू ने कुशवाहा जाति के बागी कुमार वर्मा को अपना उम्मीदवार बनाया था।

परिसीमन के बाद गैरराजपूत उम्मीदवारों को भी प्रमुख पार्टियां मैदान में उतारने लगी हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि परिसीमन के बाद औरंगाबाद का जातीय समीकरण बदला है। राजपूतों का दबदबा कम हुआ है। वैसे में गैरराजपूत भी मजबूत चुनौती खड़ी कर रहे हैं। इससे एक बात स्पष्ट है कि राजपूत के खिलाफ यादव, मुसमलान और कुशवाहा उम्मीदवार ही राजपूतों को चुनौती दे सकते हैं। उस इलाके में कुशवाहा जाति की बडी आबादी मानी जा रही है। राजनीतिक जानकारों की मानें तो औरंगाबाद संसदीय क्षेत्र में यादव, कुशवाहा और राजपूत की आबादी लगभग बराबर हो गयी है। मुसलमान की स्थिति भी मजबूत है। यही कारण है कि चितौड़गढ़ के धराशायी करने की इच्छा प्रबल होने लगी है। लेकिन राजनीतिक समीकरण अभी राजपूत के पक्ष में ही बनता दिख रहा है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस को हराया था। जदयू तीसरे स्थान पर था। भाजपा के सुशील सिंह को लगभग 3 लाख 80 हजार वोट (40 फीसदी) मिले थे, जबकि कांग्रेस के निखिल कुमार को 2 लाख 42 हजार (31 प्रतिशत) वोट मिले थे। जदयू के बागी कुमार वर्मा 1 लाख 36 हजार (18 फीसदी) को वोट मिला था।
कौन-कौन हैं दावेदार
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औरंगाबाद में इस बार भी चितौड़गढ़ ध्वस्त होने की उम्मीद नहीं दिख रही है। मुख्य मुकाबला सुशील सिंह और निखिल कुमार के बीच ही होने की उम्मीद है। सुशील सिंह भाजपा से लड़ेंगे या जदयू में घर वापसी करेंगे, अभी तय नहीं है। लेकिन एनडीए से उनकी उम्मीदवारी निर्विवाद है। निखिल कुमार को लेकर कुछ संशय बरकरार है। उनकी उम्र भी काफी हो गयी है और दो बार हार चुके हैं। इस आधार पर उनके दावे को कमजोर माना जा सकता है। लेकिन कांग्रेस के पास उनके अलावा कोई विकल्प नहीं है। यदि यह सीट राजद के कोटे में गयी तो राजद इस सीट पर यादव या कुशवाहा को मैदान में उतार सकता है। औरंगाबाद से मिल रही खबर के अनुसार, औरंगाबाद के पूर्व विधायक सुरेश मेहता भी जोर आजमाईश कर रहे हैं। इसके साथ ही औरंगाबाद जिला परिषद अध्यक्ष के पति संजय यादव भी अपनी दावेदारी को लेकर गंभीर बताये जा रहे हैं। कुल मिलाकर चितौड़गढ़ का संग्राम अभी राजपूतों की रणभूमि से आगे बढ़ता नहीं दिख रहा है। लेकिन नयी राजनीतिक संभावनाओं की तलाश भी तेजी से हो रही है।

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