कन्हैया, कम्युनिस्ट और बेगूसराय

वर्तमान परिस्थिति  में नवागांतुक राजनीतिक उन्माद को देखते हुए जेएनयू छात्र-संघ अध्यक्ष कन्हैया को ले कर लोगों के मतांतर के बीच बेगूसराय के डॉयनामिक राजनीतिक-सामाजिक चरित्र को साझा कर रहे हैं अमरदीप झा गौतमkanhaiya

बेगूसराय बिहार का ऐसा जिला है, जो पूरे विश्व में कम्युनिस्टो के गढ़ के रूप में रहा है और यही कारण है कि इसे लेनिन-ग्राद के रुप में जाना जाता रहा.

एक ऐसा भारत-खंड, जिसकी बहुसंख्यक आबादी अखंडित ब्राह्मणों (ब्राह्मण और भुमिहार) की है, जो अपने बुद्धिबल, साहस और निडरता की ऐतिहासिक विरासत समेटे हुए है.

बिहार-केशरी श्रीकृष्ण सिंह के द्वारा महात्मा गांधी आहुत नमक-सत्याग्रह आंदोलन की अगुवाई से लेकर स्वतंत्र भारत के सुलझे नेता के रूप में बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री होने और बार-बार निर्वाचित होने के बावजूद अपने प्रतिद्वन्द्वी श्री अनुग्रह नारायण सिंह की मुक्त-कंठों से प्रशंसा करने वाली शख्सियत के अतुलनीय प्रयास का फल रहा कि बरौनी रिफाइनरी, बरौनी फर्टिलाइजर, बरौनी थर्मल के साथ-साथ दर्जनो कारखानों की वजह से मिथिलांचल, अंगप्रदेश और मगध का यह सीमांचल-प्रदेश बिहार की औद्योगिक-राजधानी के रूप में भारत में अपना स्थान रखता है.

ठेकेदारी और रंगदारी के कारण आपसी रंजिश और अस्थिर माहौल के कारण बिहार के आपराधिक और राजनीतिक उठा-पठक में इसकी मुख्य-अक्ष की भूमिका रही, पर कम्युनिस्टो की अपनी पकड़ हमेशा रही, जिसका प्रमाण शत्रुधन प्रसाद सिंह सरीखे जमीन से जुडे नेता रहे.

कम्युनिस्टों का पतन

जब नब्बे के दशक के अंत में कम्युनिस्टो के अंत की आधारशिला हुई तो यादव, कुर्मी, दलित और मुसलमान को लेकर लालू और काँग्रेस के गठजोड़ ने भ्रामक वातावरण तैयार किया, जिसकी भेंट कम्यूनिस्टो के साथ बेगुसरय की अगड़ी जातियों का वर्चस्व भी हो गया और कालान्तर में अन्य पिछडी जातियों और मुसलमानों ने बेगुसरय को भाजपा और जदयू के नाम पर हथियाने की कोशिश की और बहुत हद तक सफल भी रहे.

ये हथकंडा भूमिहारों को नागवार गुजरा और इन्होंने खुद को राष्ट्रीय दलों के अलावा क्षेत्रीय दलों में अपनी पैठ बनाकर अपनी विरासत को बनाकर रखना चाहा और बहुत हद तक कामयाब भी रहे, यही कारण है कि किसी भी दल के भूमिहार नेता बेगुसरय में बिहार के किसी भी दूसरे प्रान्त की तुलना में ज्यादा अपनत्व अनुभव करते हैं.

बदलता राजनीतिक परिदृश्य

पिछले पन्द्रह वर्षों के राजनैतिक उठा-पठक में नीतिश कुमार को समर्थन देने के लिये अन्य जातियों के साथ मिलकर, खुद नीतिश कुमार को सत्तासीन और उसकी अगुवायी करने के बावजूद 2014 में नरेन्द्र मोदी और भाजपा को एकमुस्त वोट किया. लेकिन यह बौद्धिक-वर्ग 2015 बिहार विधान-सभा में आपसी कलह और क्षद्म-राजनैतिक दुराग्रहों के कारण सभी तरह के सियासी अटकलों के बीच यादवों और मुसलमानों को अनायास अभयदान देते हुए राजद और काँग्रेस को संजीवनी का काम करता है, जिसकी अपेक्षा किसी राजनीतिक-पंडितो को भी नहीं थी.

संचार माध्यमों में बेगुसराय

पिछले साल से लगातार एनटीवी पर ‘बेगुसराई’ नामक एक धारावाहिक प्रसारित किया जा रहा है, जिसको देखने से बेगुसराय की जो छवि बनती है, वो फ़िल्मी है और वर्तमान से बिल्कुल अलग है, पर अतीत से अछूती नहीं है. कुछ महीनों पहले एवीपी न्यूज ने अपने प्राईम टाईम में बेगुसराय का जो चित्रण प्रस्तुत किया, वह वर्तमान बेगुसराय को लेकर नहीं था, बल्कि पूर्वाग्रह-ग्रस्त था.

जेएनयू विवाद में राष्ट्रद्रोह का आरोपी जेएनयू अध्यक्ष कम्युनिस्ट पार्टी का नेता कन्हैया कुमार बेगुसराय के बिहट गाँव का रहने वाला है, जो उमर खालिद और अनिर्बान भट्टाचार्या के कार्यक्रम का समर्थक है.

भाजपा विरोधी एकजुटता

कन्हैया की गिरफ्तारी से बेगुसराय में पसरी उदासी और उसके अंतरिम जमानत पर जोरों की आतिशबाजी कम्युनिस्टों की बुझती आग को हवा तो देती ही है और साथ ही उन इरादों को बल भी देती है, जो नरेंद्र मोदी, भाजपा और हिंदुत्व जैसे मुद्दों को उठने से सशंकित हैं, ऐसे में भाजपा-विरोधी ताकतो का एकजुट होना लाजिमी है.

न्यायालय के द्वारा अंतरिम जमानत देते हुए जज का, वर्तमान स्थिति के प्रति दुख जताना और कन्हैया को हिदायत देना, फ़िर भी कन्हैया का प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अभद्रतापूर्वक संबोधन करना एक गंभीर चिंता का विषय है. राजनेताओं के द्वारा मनोबल के साथ-साथ धन और राजनीतिक सम्बल देना, वर्तमान में कन्हैया को ऊर्जा तो दे रहा है, पर अतीत की गलतियों से यही प्रतीत होता है कि कहीं ये सिर्फ भाजपा-विरोधी गुट के प्यादे के रूप में बनकर ना रह जाये…

About The Author

अमरदीप झा गौतम पटना के एलिट इंस्टिच्यूट के निदेशक हैं. बेगूसराय के मूल निवासी के बतौर वह वहां के राजनीतिक-सामाजिक हालात का हिस्सा रहे हैं.

 

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