कभी घर-घर बोली जाने वाली भाषा संस्‍कृत अब गाँवों में सिमट कर गई : डॉ अनिल सुलभ

भारत की प्राचीन भाषा ‘संस्कृत’ जो कभी देश के घर-घर में बोली जाती थी, दुर्भाग्यवश अब सिमट कर कुछ गाँवों की भाषा रह गई है. महाराष्ट्र और दक्षिण-भारत के उन कुछ गाँव के लोग धन्यवाद के पात्र हैं, जिन्होंने इस आर्य भाषा को अब भी बचा कर रखे हैं. एक बड़े षडयंत्र के साथ संस्कृत को भारत में हीं समाप्त कर दिया गया, जिसमें हमारे निगूढ़ ज्ञान और विज्ञान का अनन्य भंडार था. जिसका आधार लेकर संसार के अन्य विकसित राष्ट्रों ने व्यापक वैज्ञानिक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं. हमारी हीं पूँजी लेकर वे हमसे आगे निकल गए, और हम पिछड़ते चले गए.

नौकरशाही डेस्‍क

यह बातें बिहार हिंदी साहित्य सम्मेलन में,संस्कृत के महान आचार्य और दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति आचार्य आद्याचरण झा की जयंती पर आयोजित विचार-गोष्ठी और कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही. डा सुलभ ने कहा कि, संस्कृत को लोप-गह्वर से निकालने के लिए, आद्या बाबू जीवन भर संघर्ष करते रहे. अपने सामर्थ्य भर उन्होंने कोई यत्न नही छोड़ा. विश्वविद्यालयों,महाविद्यालयों और विद्यालयों में ‘संस्कृत’अनिवार्य किया जाए,इस हेतु भी उन्होंने समस्त उपक्रम किए. उनके प्रयासों का कुछ फल भी हमें मिला,किंतु अपेक्षित आज तक नहीं मिला. देश की चिंता करने वाले प्रबुद्ध लोग आचार्य जी के ऋणी हैं.

अतिथियों का स्वागत करते हुए, सम्मेलन के साहित्यमंत्री डा शिववंश पाण्डेय ने कहा कि, आद्या बाबू का पूरा घर संस्कृतमय था. उनकी धर्म-पत्नी भी संस्कृत की विदुषी थी. उन्होंने राम-कथा से जुड़े संपूर्ण वांगमय का संस्कृत अनुवाद किया था. भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति डा शंकर दयाल शर्मा आद्या बाबू की विद्वता से इतने प्रभावित थे की उन्होंने न केवल आद्या बाबू को राष्ट्रपति सम्मान से विभूषित किया, बल्कि संस्कृत की सेवा के लिए दिए जाने वाले ‘राष्ट्रपति-सम्मान’के लिए चयन करने वाली समिति का भी उन्हें सदस्य बनाया. आद्या बाबू ने अनेक पुस्तकेनभि लिखी; अनुवाद भी किए और एक पुस्तकालय की भी स्थापना की. सम्मेलन के उपाध्यक्ष नृपेंद्र नाथ गुप्त तथा प्रो वासुकी नाथ झा ने भी अपने विचार व्यक्त किए.

इस अवसर पर आयोजित कवि सम्मेलन भी कुछ अलग सा रहा. इसका आरंभ डा शंकर प्रसाद ने महाकवि कालीदास के मेघदूत से संस्कृत में वाणी वंदना से किया. उन्होंने अपनी ग़ज़ल “यूँ न सताओ अब जान पे बन आई है/आ भी जाओ अब जान पे बन आई है”का सस्वर पाठ किया. कवयित्री डा सुधा सिन्हा ने सावन की फुहार को शब्द देते हुए यों कहा कि, “ सावन की घटा जब बरसती है/ मन में गुदगुदी सी होती है”.

कवि सुनील कुमार दूबे ने शहारों में पसरी हृदय-हीनता को इस प्रकार शब दिए कि, “सफ़र में कौन साथ देता है!क़हर में कौन साथ देता है! शुक्र है कि ये जहिलों की बस्ती है/वरना शर में कौन साथ देता है?” व्यंग्य के कवि ओम् प्रकाश पाण्डेय’प्रकाश’ ने नेताओं को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि “घोर मिलावटी दौर में भी/ बिना मिलावट शत प्रतिशत शुद्ध/बिकते जाती के ज़हर/तमाम सजे हुए वोट के बाज़ार हैं”.

सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने भी अपने गीत, “नैन मिले हैं जब से उनसे, क्या हुई है बात/ मंत्र-भारित हो गए हैं, हर एक दिन हर रात” , का सस्वर पाठ किया. वरिष्ठ कवि जय प्रकाश पुजारी, राज कुमार प्रेमी, सच्चिदानंद सिन्हा, अर्जुन प्रसाद सिंह, डा विनय कुमार विष्णुपुरी,आकाश कुमार, डा नागेशवर प्रसाद यादव, कुमारी मेनका,डा नागेशवर प्रसाद यादव हीरा लाल शर्मा आदि कवियों ने भी काव्य-पाठ के साथ आद्या बाबू के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की. मंच का संचालन योगेन्द्र प्रसाद मिश्र ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया.

 

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