कलेक्टर राज के ‘रोग’ का शिकार मनरेगा

मनरेगा पर कैग रिपोर्ट सिक्के सिर्फ एक पहलू है पर उसके अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता- पढ़ें प्रोफेसर अश्विनी कुमार का यह आलेख-
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विशेषज्ञ और नीति-निर्माता इस बात पर सहमत हैं कि मनरेगा पैसों के दुरुपयोग और भ्रष्टाचार के कारण प्रभावित हो रहा है.ग्रामीण आजीविका की सुरक्षा का इसका वादा सत्ता के विकेंद्रीकरण और ग्रामीण गरीब की लामबंदी में निहित है.लेकिन इसका कई स्तरीय क्रियान्वयन, केंद्रीकृत व्यवस्था, गवर्नेस का नौकरशाही तरीके से चलना दुर्भाग्यपूर्ण है.

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रलय द्वारा संशोधित मनरेगा 2 शुरू करना जहां एक तरफ मनरेगा की ऐतिहासिक उपलब्धियों को मजबूत करता है, वहीं केंद्रीकृत नौकरशाही और विकेंद्रीकृत सामुदायिक गवर्नेंस के बीच बढ़ते तनाव को भी सामने लाता है. मानें या न मानें मनरेगा की सफलता या विफलता तथाकथित ‘कलेक्टर राज’ के इर्द-गिर्द घूमती है.

केंद्रीय मंत्रालय, सचिवों और प्रगतिशील राजनेताओं के नेक इरादों के बावजूद राज्यों में क्रियान्वयन ‘कलेक्टर राज’ के अक्षम और भ्रष्ट जिला ग्रामीण विकास एजेंसी (डीआरडीए) पर निर्भर है. इसलिए मनरेगा पर आयी कैग रिपोर्ट न ही अचंभित करती है, न ही यह कोई पूर्वानुमान है.

असफलता का कारण

मनरेगा के क्रियान्वयन पर कैग की 2008 की रिपोर्ट में भी निगरानी करने में मंत्रालय की विफलता और विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा योजना की अनदेखी करने को लेकर सवाल उठाये गये थे. कैग ने तब राज्यों द्वारा क्षमता निर्माण में कमी को क्रियान्वयन की असफलता का महत्वपूर्ण कारण माना था.

कैग की 2013 की रिपोर्ट 2008 की ही तरह भ्रष्टचार और गरीब मजदूरों को नजरअंदाज करने की बात को दोहराती है. औसत काम का घट कर 47 दिन होना योजना के प्रति राज्य और जिला प्रशासन के कम होते उत्साह को दिखाता है. ध्यान देने की बात है कि नरेगा में बढ़ती हुई पारदर्शिता और सोशल ऑडिटिंग के नये सुधार की वजह से भी खर्च कम होता दिख रहा है.

कैग रिपोर्ट उन जिलों की तरफ हमारा ध्यान नहीं आकर्षित करती है, जहां भ्रष्टाचार की घटनाओं में ह्रास के प्रमाण मिले हैं. आंध्र प्रदेश और राजस्थान के कुछ जिलों में जहां मनरेगा पर औसतन 400 करोड़ खर्च होते थे, वहां बढ़ती पारदर्शिता की वजह से खर्च आधा हो गया है. इससे काम के औसत दिनों पर भी असर पड़ा है.

मनरेगा के तहत 4070 करोड़ रुपये का अधूरा काम निश्चित तौर पर एक बड़ी कमी है. कैग की रिपोर्ट के अनुसार अब तक इस योजना पर 1.5 लाख करोड़ रुपये खर्च किये जा चुके है. लेकिन, 14 राज्यों में 1.26 लाख करोड़ रुपये के कामों में महज 30 फीसदी काम ही पूरा हो पाया है. कैग के आंकड़े दर्शाते हैं कि बिहार, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश जैसे तीन राज्यों में जहां देश के कुल गरीबों का 46 फीसदी रहते हैं, वहां इस मद में केवल 20 फीसदी फंड का ही आवंटन किया गया.

कैग की यह आलोचना सही है कि गरीब राज्य मनरेगा के फंड का सही उपयोग नहीं कर पाये. हालांकि बिहार में 2012-13 में 37 दिनों का औसत काम मिला है. नीतीश कुमार आज भी लालू प्रसाद के प्रशासनिक कुशासन की विरासत से संघर्ष करते दिखायी दे रहे है.

कैग ने 38 हजार लाभार्थियों का साक्षात्कार लिया. 75 फीसदी ने माना कि उनके गांवों में सोशल ऑडिटिंग का काम कभी नहीं हुआ. मैं इस विश्‍लेषण से सहमत हूं कि ग्रामीण विकास मंत्री की अध्यक्षता वाली वैधानिक संस्था सेंट्रल एंप्लायमेंट गारंटी काउंसिल एक अक्षम संस्था बन कर रह गयी है और योजना के लागू होने के 6 साल बाद भी मूल्यांकन और निगरानी करने में असफल हुई है. इस दिशा में मंत्रालय का एक स्वतंत्र संस्था गठित करने का प्रयास सराहनीय है.

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