कहीं तूट न जायें सपने

एक ऐसे युवा की आपबीती जिनका चयन चीन में भारतीय सांस्कृतिक दूत के रूप में तो हो गया पर पास्पोर्ट बनाने में नौकरशाही का रवैया उनके सपनों का गला रेत रहा है.

दीपक मंडल- कहीं तूट न जायें सपने

दीपक मंडल- कहीं तूट न जायें सपने

मैरा पास्पोर्ट पुलिस साक्षत्कार न होने के कारण नही बन पाया. और मैं शायद अब दूसरी बार चीन जाने से वंचित रह जाऊंगा. लेकिन मैंने अपने पास्पोर्ट बनवाने के प्रयास के क्रम में नौकरशाही के जिस चरित्र और चेहरे से रू-ब-रू हुआ वह मन-मस्तिष्क को हिला देने वाले रहे.

केंद्र सरकार के युवा मामले के मंत्रालय ने ने एक प्रस्ताव दिया था कि देश के 100 युवाओं को चीन भेजा जाय. इसका मतलब यह था कि युवाओं की यह टीम वहां जा कर अपनी संस्कृति और मूल्यों को वहां प्रोमोट कर सकें. साथ ही वे चीन की संस्कृति से खुद भी अवगत हो सकें और इस यात्रा से यह भी उम्मीद की गयी कि ऐसे करने से दोनों देशों के युवाओं में अच्छे रिश्तों को बढ़ावा मिल सके.

यह यात्रा 13 मई 2013 से 22 मई 2013 तक के लिए निर्धारित की गयी थी.
इस से जाय्दा क्या लिखू. मेरे पास्पोर्ट का आवेदन पास्पोर्ट कार्ययल से एसपी कार्यलय पटना के लिऐ 27/4/13को चला. फिर वहां से 4/5/13को मोकामा थाना के लिऐ भेजा गया ताकि वेरिफिकेशन की कार्रवाई हो सके.इसका पत्राक संख्या 6546/13था पर आभी तक मैरा मोकामा थाना से कोई कार्रवाई आगे नहीं बढ़ी है.

पासर्पोट बनाने के लिऐ एक ऐसे रास्ता पता का भी पता चल गाया जो हम जैसे युवा जो ईमानदारी का दामन हाथ से नहीं छोड़ सकते, उनके लिए नहीं है. अगर आप नौकरशाही को खुश नहीं कर सकते, उनकी जेब गर्म नहीं कर सकते तो आप को यह भ्रम नहीं पालना चाहिए कि आपका काम हो ही जाये. संभव है कि कुछ लोगों का काम बिना लेन-देन के हो भी जाता हो, पर मैंने जो महसूस किया, जो अनुभव किया वह उत्साह को तोड़ने वाला रहा.
हां इस अनुभव ने हमें बिहार के नौकरशाही से भलिभाति परचिचय करा दिया.

सम्पादकीय नोट- दीपक ने यह जानकारी हमें आज ही यानी 6 मई को दी है. हमने अपने स्तर पर कोशिश की है कि उनका पास्पोर्ट बन जाये. देखिए क्या होता है

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