कानून बदलने से जरूरी है समाज बदलना

राज्यसभा में लोकपाल बिल पास होने की ख़ुशी है, इसके बावजूद कि मैं सोचता हूं कि जब 35 हज़ार कानूनों से देश की तकदीर नहीं बदली, तो एक और कानून से क्या हो जाएगा? अगर सिस्टम में बैठे लोग ईमानदार, कर्तव्यनिष्ठ और दूरदर्शी हों, तो वे कमज़ोर से कमज़ोर कानून से अच्छे नतीजे दे सकते हैं और अगर वे ऐसे नहीं होंगे, तो फिर अच्छे से अच्छे कानून का भी कोई ख़ास फ़ायदा नहीं होगा। lokpal

अभिरंजन कुमार

एंटी-रेप लॉ के उदाहरण से इसे अच्छी तरह समझा जा सकता है। पब्लिक डिमांड पर बने इस कानून के लागू होने के बाद से अकेले दिल्ली में रेप के दोगुने मामले दर्ज हुए हैं। देश के अनपढ़-अशिक्षित लोगों से लेकर तरुण तेजपाल जैसे अति-जागरूक लोगों तक पर ऐसे आरोप लग रहे हैं। इसीलिए कानून को बदलने की ज़रूरत को मैं ख़ारिज नहीं कर रहा, लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है समाज को बदलना।

लोगों में शिक्षा और संस्कार के स्तर को बेहतर करना। उन्हें ज़िम्मेदार बनाना। उनमें नैतिक-बल भरना। पिछली बार ख़ुद अन्ना कह रहे थे कि लोकपाल बन जाने के बाद देश में 60 से 70 प्रतिशत भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाएगा, इस बार कह रहे हैं कि 40 से 50 प्रतिशत भ्रष्टाचार ख़त्म होगा। इस तरह के अंकगणित पर मुझे कतई भरोसा नहीं होता है, फिर भी 40 साल से अटके इस कानून का पास होना स्वागत योग्य है।

यह भी सोच रहा हूं कि जिस सहजता से अन्ना इस बिल के पास होने पर ख़ुशी जता रहे हैं और राहुल गांधी का धन्यवाद कर रहे हैं, क्या केजरीवाल के साथ होने पर भी वह इसी तरह प्रतिक्रिया व्यक्त करते? शायद नहीं। केजरीवाल तो अब भी यही कह रहे हैं कि कमज़ोर कानून बन रहा है। और अन्ना कह रहे हैं कि पहले एक कानून बन तो जाए, फिर उसमें वक्त के साथ सुधार होते रहेंगे। चूंकि मैं पहले ही कह चुका हूं कि किसी एक तथाकथित महान से महान कानून से मुझे अधिक उम्मीद नहीं रहती, इसलिए मुझे कल भी अन्ना का स्टैंड अधिक लोकतांत्रिक लगता था और आज भी लगता है कि जिस कानून पर देश में आम सहमति है, उसके बन जाने में कोई बुराई नहीं। बाद की बातें बाद में देखेंगे। लेकिन इतना मुझे आज भी लग रहा है कि अन्ना और केजरीवाल की फूट से भले आम आदमी पार्टी का जन्म हो गया, लेकिन एक महत्वपूर्ण आंदोलन की मृत्यु हो गयी।

बहरहाल, जनता की नज़रों से दूर होती जा रही कांग्रेस के ताज़ा पांसे ग़ौर करने लायक हैं। लोकपाल देकर अन्ना को भी ख़ुश कर दिया और दिल्ली का मुख्यमंत्री बनवाकर केजरीवाल को भी कसने की तैयारी कर ली है। कई लोग मुझसे सहमत नहीं होंगे, लेकिन अब भी मैं मानता हूं कि कांग्रेस बेहद घाघ पार्टी है और उससे पार पाना इतना आसान नहीं है। जैसे मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ हो गया, वैसे ही दिल्ली में भी होना तय ही था, जो हुआ भी, लेकिन केजरीवाल के सहारे उसने बीजेपी का रास्ता रोक दिया। ज़्यादातर सीटें जो केजरीवाल ने जीतीं, वो बीजेपी के खाते में जानी थीं। मतलब साफ़ है कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी के उभार से कांग्रेस को नहीं, बल्कि बीजेपी को नुकसान हुआ है। आम आदमी पार्टी ज़्यादातर एंटी-कांग्रेस वोट यानी बीजेपी के वोट काट रही है। कांग्रेस को मालूम है कि अभी वह ख़ुद एक बड़ी लाइन नहीं खींच सकती, इसलिए किसी भी तरह बीजेपी की लाइन छोटी करनी है। इसीलिए लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी के ज़रिए उसकी कोशिश होगी कि बीजेपी को जगह-जगह नुकसान पहुंचाया जाए। दिल्ली में केजरीवाल की सरकार को बाहर से समर्थन देकर इस काम को बखूबी अंजाम दे सकेगी।

इसीलिए भाइयो और बहनो, भ्रष्टाचार और महंगाई पर अंकुश लगने वाला है, इस तरह के ख्याली-पुलाव खाने वालों की पंगत में बैठना अच्छा लगता है, लेकिन देश की सियासत में क्या खिचड़ी पक रही है, इसपर भी नज़र रखना ज़रूरी है। अपनी तमाम जनपक्षधरता और क्रांतिधर्मिता के बावजूद कई बार मैं सोचता हूं कि बिहार के मी़डिया और समाज में मैंने जो भी पहल की, उसका फ़ायदा किसे मिला? अन्ना और केजरीवाल की ईमानदारी पर शक नहीं है, लेकिन यह आशंका ज़रूर है कि वे भले अपनी-अपनी राह चलते रहेंगे, लेकिन सियासत के घाघ लोग अपने-अपने फ़ायदे के लिए अपने-अपने तरीके से उनका इस्तेमाल कर लेंगे और परिवर्तन उनकी ख्वाहिशों जितनी मात्रा में नहीं, बल्कि उतनी ही मात्रा में होगा, जितने के लिए इस देश का नागरिक समाज अभी तैयार है और सृष्टि के नियम के तहत जितना स्वाभाविक है.

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

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