किशोर, करियर और कामुकता

अमरदीप झा गौतम

किशोरों में करियर बनाने का जो सबसे निर्णायक दौर होता है उसी दौर में इनमें विपरीत सेक्स के प्रति आकर्षण अपने चरम पर होता है. दर असल यह पीरियड उनके शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और जैविक विकास का भी महत्वपूर्ण दौर होता है.ऐसे में सावधानी, चेतना और स्वनियंत्रण का थोड़ा भी असंतुलन करियर को चौपट करने के लिए काफी है.

विपरीत सेक्स की तरफ आकर्षण एक प्राकृतिक गुण है.जो हर किशोर-किशोरी में लाजिमी तौर पर होता है. कई बार यह आकर्षण उग्रता के स्तर तक पहुंच जाता है. इस कारण कोशोर या युवा अगर अपनी ऊर्जा का संतुंलित उपयोग न करें और खुद को नियंत्रित न रखें तो इसका सीधा विपरीत प्रभाव उनके करियर पर पड़ता है. कई बार, ऐसी स्थिति में योग्य, कर्मठ और तेज बुद्धि के युवा इतना भटक जाते हैं कि उनका करियर और भविष्य तक ध्वस्त हो जाता है.

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लेकिन ऐसा भी होता है कि जो छात्र पूरी एकाग्रता के साथ अपनी ऊर्जा पढ़ाई पर लगाते हैं वह नहीं भटकते और नतीजतन उनके हिस्से में बड़ी सफलता आती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि एक युवा अपने करियर और अपने अंदर हो रहे जैविक बदलावों के प्रति कैसे संतुलन बनायें? वह क्या करें कि विपरीत सेक्स के प्रति आर्कषण उनके करियर को चौपट करने की हद तक न पहुंचे?

लगभग पिछले एक दशक से अपने छात्रों को पढ़ाने के दौरान मैंने इस समस्या को काफी बारीकी से देखा और महसूस किया है.मेरे ऐसे कई छात्र रहे हैं जो तमाम योग्यताओं और संभावनाओं के बावजूद थोड़ा सा आत्मनियत्रंण के अभाव में भटकने के कागार पर पहुंच गये.

पर मेरा मानना है कि ऐसे छात्रों को प्रोपर काउंसिलिंग के द्वारा भटकने से बचाया जा सकता है.और ऐसा करके उनकी ऊर्जा का उचित उपयोग करने की प्रेरणा दी जा सकती है. इस बात के मद्देनजर मैं यह महसूस करता हूं कि पढ़ाई के साथ साथ किशोरों को समय समय पर काउंसिलिंग की जरूत पड़ती है.

हमें यह समझना चाहिए कि किशोरों में विपरीत सेक्स की तरफ आकर्षण एक साकारात्मक बदलाव का हिस्सा है,न कि यह कोई शारीरिक या मानसिक व्याधि है. ऐसे में इस आकर्षण को दमित करके रोका नहीं जा सकता, बल्कि इस आकर्षण( या यूं कहें कि कभी कभी उग्र आकर्ण) के साथ सहयोगात्मक रवैया अपनाते हुए किशोरों को स्वनियंत्रण की सीख दी जा सकती है.
बदलते समय में मीडिया, फिल्म टीवी चैनल और इंटरनेट ने कोशोरों पर काफी प्रभाव डाला है. यह प्रभाव कई बार साकारात्मक के बजाये नाकारात्मक भी हो जाता है. नतीजा यह होता है कि छात्र पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के बदले कामुकता के निकट ज्यादा होते चले जाते हैं.

ऐसे में उनके अंदर कामुकता और यौनाकर्षण के प्रति बढ़ते रुझान को नियंत्रित रखना खुद छात्रों के अलावा अभिभावकों और शिक्षकों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है. ऐसी स्थिति में अगर कोई शिक्षक यह मान कर चले कि उनका काम सिर्फ पाठ्यपुस्तकों की शिक्षा देना है तो यह उचित नहीं होगा.

इसी तरह अभिभावकों के लिए भी यह उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह इस बात का ध्यान दें कि उनके बच्चे का रुझान पढ़ाई की तरफ है या नहीं. इस लिए उनकी यह जिम्मेदारी है कि वह यह सुनिश्चित करें कि उनके बच्चे को उचित माहौल मिले. और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि खुद छात्रों को भी इस बात को बखूबी समझने की जरूरत है.

यौनाकषर्ण की उग्रता कई बाहरी कारणों के साथ आंतरिक या जैनेटिक कारकों पर भी निर्भर करता है. जैनेटिक कारकों पर भले ही हम बहुत ज्यादा प्रभावी तरीके से निपटने में सफल न हो पायें पर इतना तय है कि हम बाहरी कारकों को समझ कर छात्रों का उचित मार्गदर्शन तो कर ही सकते हैं.

शिक्षा और करियर के प्रति छात्रों में दिलचस्पी बनाये रखने के लिए शिक्षकों की अहम भूमिका हो सकती है. लेकिन शिक्षा के व्यवसायीकरण के इस दौर में अधिकतर शिक्षक अपनी इस जिम्मेदारी को पूरा करने से बचते हैं. जिस तरह स्कूली स्तर पर नौतिक शिक्षा, और सेक्स एजुकेशन को अनिवार्य हिस्सा बनाने की बात पर जोर दिया जा रहा है ठीक इसी तरह के प्रयास करियर- कोचिंग चलाने वाली संस्थानों में भी होना चाहिए.

शिक्षकों को छात्र-छात्राओं से सेक्स और मोरल एजुकेशन पर खुल कर बात करना चाहिए. बल्कि इस विषय पर निश्चित अंतराल पर कक्षायें आयोजित की जानी चाहिए. और इस संबंध में उनकी समस्याओं के समाधान का प्रयास किया जाना चाहिए. मैं इस बात पर पूरी तरह विश्वास करता हूं कि एक सफल शिक्षक किशोरों को उचित मार्गदर्शन और प्रेरणा दे कर छात्रों के करियर को चौपट होने से बचा सकते हैं.

लेखक इलिट इंस्टीच्यूट के निदेशक, करियर काउंसलर और भौतिकी के जाने माने शिक्षक हैं

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