कुछ ऐसे उभरी नौकरशाहों में पार्टीगत विचारधारा

अतुल चौरसिया के लेख के पिछले भाग में आपने नौकरशाहों की निष्ठा पर पढ़ा था अब पढ़ें पिछड़ी जाति के उभार के बाद कैसी बदली नौकरशाही.

नौकरशाहों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती,( न्यू इंडियन एक्सप्रेस)

नौकरशाहों के साथ तत्कालीन मुख्यमंत्री मायावती,( न्यू इंडियन एक्सप्रेस)

1989 से पहले ज्यादातर समय तक उत्तर प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस पार्टी रही थी. ज्यादातर कांग्रेसी मुख्यमंत्री ब्राह्मण थे. नौकरशाहों के मामले में उनकी अपनी पसंद-नापसंद होती थी. भाजपा नेता हृदय नारायण दीक्षित बताते हैं, ‘फिर भी कांग्रेसी सरकारों की निरंतरता के कारण यह समस्या 89 से पहले दिखाई नहीं पड़ती थी. 89 में मुलायम सिंह यादव की सरकार आने के बाद यह समस्या गहराने लगी. क्षेत्रीय और जातिगत अस्मिता की राजनीति करने वाले यादव ने अपने विश्वासपात्र अधिकारियों का गुट बनाना शुरू कर दिया. हम कह सकते हैं कि पार्टीगत विचारधारा पर बाबुओं के बंटवारे की नींव यहीं से पड़ी.’

बदलाव की शुरूआत

1989 के बाद एक-दो अवसरों को छोड़ दें तो सपा और बसपा नियमित अंतराल पर उत्तर प्रदेश की सत्ता में आती-जाती रहीं. इसी दरमियान मंडल कमीशन की सिफारिशें लागू हो जाने के बाद नौकरशाही में पिछड़े तबकों के अधिकारियों की आमदरफ्त भी तेज हो गई थी.

स्वाभाविक रूप से पिछड़े तबके के ज्यादातर अधिकारी पिछड़ा राजनीति करने वाले मुलायम सिंह यादव के करीब चले गए. इसी तरह दलित अधिकारियों की फौज मायावती के इर्द-गिर्द इकट्ठी होने लगी. इस दौरान एक और बदलाव हुआ. सवर्ण राजनीति के दिन लद गए तो सवर्ण अधिकारियों ने भी अपने लिए छांव तलाशना शुरू कर दिया. अपनी सुविधा के हिसाब से इन अधिकारियों ने भी सपा-बसपा का चुनाव कर लिया.

वरिष्ठ पत्रकार गोविंद पंत राजू कहते हैं, ‘सन नब्बे के बाद सपा-बसपा की निरंतर बनी सरकारों ने अधिकारियों के इस बंटवारे को और मजबूत किया. इस दौरान कांग्रेस या बीजेपी की कुछ सरकारें बनतीं तो यह ताल टूटती, पर ऐसा नहीं हुआ.’ मंडल से पहले अधिकारियों का बंटवारा ब्राह्मण और गैरब्राह्मण के आधार पर होता था. मंडल के बाद ओबीसी, एससी-एसटी और जनरल का बंटवारा हो गया है.’

मुलायम सिंह की तुलना में मायावती ने इस चलन को अलग कारण से कुछ ज्यादा ही तूल दिया. यह कारण था उनकी शंकालु और असुरक्षित प्रवृत्ति. मायावती के बारे में माना जाता है कि वे बेहद अविश्वासी स्वभाव की हैं. लिहाजा उन्होंने शुरू से ही अपने विश्वासपात्र नौकरशाहों की मंडली बना ली थी. इसमें ज्यादातर अधिकारी दलित समुदाय से आते हैं.

एक जमाने में पीएल पुनिया और डीएस बग्गा भी मायावती के करीबी अधिकारी रह चुके हैं. डीएस बग्गा की कहानी बड़ी दिलचस्प है. बग्गा कांशीराम के नजदीकी थे. मायावती की सरकार बनने पर उन्हें पंजाब से यूपी लाया गया था. बग्गा की छवि एक ईमानदार अधिकारी की रही है, लेकिन मायावती के कार्यकाल में हुए ताज कॉरीडोर घोटाले के दौरान राज्य का मुख्य सचिव होने की वजह से वे भी इस मामले में आरोपित बनाए गए. इस दौरान बग्गा रिटायर हो गए. घोटाले के आरोप के कारण उनकी पेंशन तक रोक दी गई. हाल ही में उन्हें अवकाश प्राप्ति के बाद मिलने वाली सुविधाएं बहाल हुई हैं.

नौकरशाहों की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की दिलचस्प बानगी हैं मौजूदा समय में कांग्रेस के सांसद और अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष पीएल पुनिया. पुनिया एक समय में मुलायम सिंह यादव के मुख्य सचिव रह चुके हैं. बाद में वे मायावती के करीबी अफसर बन गए. बसपा की पिछली सरकार में पुनिया मुख्य सचिव थे. मायावती पीएल पुनिया को राखी बांधती थीं.

लेकिन रिटायरमेंट के बाद पुनिया ने कांग्रेस का दामन थाम लिया. उदाहरण ऐसे भी हैं जब अधिकारियों ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का अपने पद पर रहते हुए ही निर्लज्ज प्रदर्शन किया. उत्तर प्रदेश के एक पूर्व नौकरशाह हैं एनसी वाजपेयी. वे इस समय उत्तर प्रदेश प्लानिंग बोर्ड के उपाध्यक्ष हैं. 2007 में वे प्रदेश के चीफ सेक्रेटरी थे. उन्हें मुलायम सिंह यादव के सबसे खास नौकरशाहों में शुमार किया जाता था. उन्होंने पद पर रहते हुए साल 2006-07 में सपा के दफ्तर में आयोजित एक कार्यक्रम में मंच पर खड़े होकर समाजवादी विचारधारा और डॉ. राम मनोहर लोहिया पर लंबा-चौड़ा भाषण दिया. यह घटना ऐतिहासिक थी. चुनाव आयोग ने इस घटना के मद्देनजर उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठाए और 2007 के विधानसभा चुनाव से पहले उन्हें मुख्य सचिव के पद से हटाकर अन्यत्र ट्रांसफर कर दिया. वरिष्ठ पत्रकार और राज्य के प्राविधिक शिक्षा विभाग में सलाहकार फरजंद अहमद कहते हैं, ‘नौकरशाह किसी पार्टी का पक्ष लेकर जनता के बीच अपनी विश्वसनीयता तो खो ही रहे हैं, संविधान के प्रति अपनी प्रतिबद्धता से भी धोखा कर रहे है.’

दुश्चक्र

अहमद एक दुश्चक्र का जिक्र करते हैं. वे कहते हैं, ‘अधिकारी शुरुआत में आते हैं. बेहद आदर्शवादी विचारों से लबरेज रहते हैं. दो-तीन पोस्टिंग तक यही हालत रहती है. छोटे शहरों और कस्बों में काम करते हैं. इस बीच उनकी शादी हो जाती है. बाल-बच्चे बड़े होने लगते हैं. अब वे अपनी पोस्टिंग किसी बड़े शहर में चाहते हैं जहां बच्चों की पढ़ाई-लिखाई अच्छे से हो सके. कोई छोटे शहरों में अपने बच्चों को रखना नहीं चाहता. इसके लिए वह किसी-न-किसी नेता का सहारा लेता है. अब जिस नेता से आपने अपने लिए एक बार कोई लाभ ले लिया वह अपने हर काम के लिए आपके पास पहुंचता रहता है. इस तरह से दोनों के बीच में कड़ी जुड़ जाती है जो दोनों ही के लिए फायदेमंद होती है.’

अधिकारियों की पार्टियों के प्रति झुकाव को एक और स्थिति से समझा जा सकता है. उत्तर प्रदेश में आईएएस अधिकारियों के कुल 592 पद हैं. इनमें से लगभग 200 पद रिक्त पड़े हैं. प्रदेश की सत्ता में काफी महत्वपूर्ण पद पर बैठे एक आईएएस अधिकारी इसे इस तरह से बताते हैं, ‘अधिकारियों के टोटे का नतीजा यह है कि एक-एक अधिकारी के पास तीन-तीन, चार-चार विभागों की जिम्मेदारी आ जाती है. इस चक्कर में अधिकारी कई-कई नेताओं और मंत्रियों के संपर्क में रहता है और जब भी उसे जरूरत पड़ती है वह येन केन प्रकारेण अपना काम किसी न किसी नेता या मंत्री के जरिए निकाल लेता है.

साभार तहलका

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