कुर्सी की सादगी और सत्‍ता की ताजगी 

राजनीतिक जीवन की सबसे ताकतवर चीज है कुर्सी। सामाजिक जीवन में भी इसकी बड़ी महत्‍ता है। बाल कटवाने के लिए नाई की कुर्सी पर बैठे हों या जनता को ‘टोपी’ पहनाने के लिए सरकार की कुर्सी पर। कुर्सी के आसपास की गरमी को आसानी से महसूस किया जा सकता है। लेकिन मीडिया के लिए कुर्सी सूनी हो तो खबर, भरी हो तो खबर।

 वीरेंद्र यादव 

पटना के अधिवेशन भवन में प्रभात प्रकाशन की तीन पुस्‍तकों को लोकार्पण का कार्यक्रम था। तीनों पुस्‍तकें चंपारण सत्‍याग्रह से जुड़ी हुई थीं। चंपारण सत्‍याग्रह की जबरदस्‍त मार्केटिंग मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार ने की। नीतीश ने सत्‍याग्रह को ‘प्रोडक्‍ट‘ बना दिया और खुद बने गये ‘प्रोडक्‍ट अंबेसडर’। मुख्‍यमंत्री के साथ उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी भी ‘सह-अंबेसडर’ बन गये हैं। नीतीश कुमार के ‘लंबित’ सपनों को जमीन पर उतारने का ‘ठेका’ सुशील मोदी ने ले लिया है। चार वर्षों तक सुशील मोदी को नीतीश ने ‘कूड़ादान’ में डाल दिया था। इस दौरान नीतीश के बहुत सारे सपने लंबित रह गये थे। जबसे नीतीश ने फिर से सुशील मोदी को ‘झाड़-पोंछ’ कर सुशासन की छड़ी थमा दी है, तब से मोदी नीतीश के लंबित सपनों को साकार करने का जिम्‍मा ढो रहे हैं।

इसका पूरा पुरस्‍कार भी सुशील मोदी को मिल रहा है। मुख्‍यमंत्री के सभी कार्यक्रमों में दूसरे नंबर के अतिथि सुशील मोदी ही होते हैं। लगता है दोनों का कार्यक्रम तय करने वाली कंपनी भी एक ही है। कार्यक्रम में कुर्सी से लेकर तौलिया तक चयन भी कंपनी ही करती है। प्रभात प्रकाशन के पुस्‍तक लोकार्पण कार्यक्रम में मंच पर छह कुर्सियां लगी हुई थीं। इनमें से बीच की दो कुर्सियों पर सफेद झकास तौलियां सबका ध्‍यान का आकर्षित कर रही थीं। इन तौलियों से कुर्सी की सादगी जगजाहिर हो रही थी और सत्‍ता की ताजगी भी।

पुस्‍तक लोकार्पण के मौके पर कई वक्‍ताओं ने अपनी राय रखी। मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी, गांधी संग्रहालय के मंत्री रजी अहमद, पत्रकार श्रीकांत, पीयूष अग्रवाल, अशोक अंशुमन आदि ने अपनी बात रखी। उपमुख्‍यमंत्री सुशील मोदी मुख्‍यमंत्री की ‘लोकप्रियता’ से गदगद थे तो नीतीश कुमार ने गांधी के सपनों से अपनी सरकार के सपनों को जोड़ दिया। लेकिन रजी अहमद का दर्द दर्शकों को कचोटता रहेगा कि चंपारण ने देश को भले आंदोलित किया हो, इससे राजनीतिक व्‍यवस्‍था बदल गयी हो, लेकिन चंपारणवासियों का दर्द सौ साल बाद भी वहीं है, जैसा गांधी जी देख और छोड़कर गये थे।

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