कुलदीप नारायण विवाद: तूफान अभी बाकी है

पटना के निगमायुक्त कुलदप नारायण पर अदालती फैसला सुरक्षित हो चुका है. निलंबन पर रोक बरकरार है.  राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारे में सन्नाटा है. पर यह सन्नाटा तूफान के पहले की खामोशी जैसी है.

kuldip narayan IAS 2005

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इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

और तूफान के पहले की इस खामोशी का एहसास कुलदीप नारायण को बखूबी है. उन्होंने इसकी अभिव्यक्ति भी प्रतीकों में की है. उन्होंने सोशल मीडिया साइट फेसबुक पर लिखा है- ‘शतरंज के खिलाड़ी.. गहरी होती जा रही है साजिश.’ यह टिप्पणी कुलदीप ने बुधवार को दोपहर में की.

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एक प्रशासनिक अफसर के लिए अभिव्यक्ति की सवतंत्रता की अपनी सीमायें हैं. श्री कुलदीप को यह बखूबी पता है. इसलिए उन्होंने अपने मन की बात अपनी सीमा में रह कर कर दी है.

इसके पहले यानी मंगलवार को पटना हाई कोर्ट ने उनके निलंबन पर सुनाई कर चुका है. फैसला सुरक्षित है. उसे सुनाने का दिन मुकर्रर नहीं है. नारायण के लिए राहत की बात यह है कि अदालत ने उन्हें नगर निगम के कमिश्नर के रूप में काम करने की आजादी दे दी है. उन्हें बिहार सरकार ने बीते शुक्रवार को काम में कोताही का आरोप लगा कर निलंबित कर दिया था.

संकट में कुलदीप

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यह जग जाहिर है कि कुलदीप नरायण और पटना के मेयर के बीच का टकराव काफी पुराना है. लेकिन यह टकराव बस इतना भर नहीं है. इसके पीछे कई साजिशी हाथ हैं. पटना में गैर कानूनी इमारतों को तोड़ने का आदेश अदालत ने दे रखा है. बीते कुछ वर्षों में बिल्डर्स ने शहर में गैरकानूनी इमारतों का जाल फैला रखा है. बिल्डरों की एक लॉबी यह कतई नहीं चाहती कि उनकी गैर कानूनी इमारतें तोड़ी जायें. ऐसे में पटना नगर निगम के सामने भारी चुनौतियां हैं. निगम पार्षदों की एक लॉबी ऐसी भी है जिन की पीठ पर बिल्डर्स लॉबी का हाथ है. अब तो राजनेताओं का एक वर्ग भी इस विवाद का हिस्सा बन चुका है. राजनीति के गलियारे से जो बातें सामने आ रही हैं उस से लगता है कि अदालत की चहारदीवारी के बाहर भी शह और मात का खेल चल रहा है. कुलदीप नारायण ने शायद शह और मात के इसी खेल का दबी जुबान में अपने फेसबुक पेज पर उल्लेख किया है कि साजिश गहरी होती जा रही है.

खबर यह भी है कि इन साजिशों में पटना हाईकोर्ट के कुछ प्रभावशाली वकील भी शामिल हो चुके हैं.

लेकिन कुलदीप नारायण के लिए संतोष की बात यह है कि इस लड़ाई में नौकरशाहों की हिमायत उन्हें मिल रही है. आईएएस एसोसिएशन और बिहार प्रशासनिक अफसरों के एसोसिएशन ने इस मामले में मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव तक अपनी बात पहुंचाई है. लेकिन नौकरशाही के मकड़जाल की सच्चाई यह है कि, वह सरकर के मजबूत स्तंभ होने के बावजूद खुल कर किसी के पक्ष में नहीं उतरती. न ही सच्चाई के पक्ष में और नहीं निर्दोष के. वह ज्यादा से ज्यादा इस बात के लिए अपनी ऊर्जा लगाती है कि निजी तौर पर उसका भला होता रहे, बस.  अफसरान सार्वजनिक तौर पर पूरी नौकरशाही बिरादरी के हितों के लिए सामने आने के बजाये  निजी तौर पर अपने हित में लगे रहते हैं. कुलदीप नारायण को शायद इसका एसास जरूर होगा. हालांकि पिछले कुछ दिनों में कुलदीप नारायण के प्रति आम लोगों की हिमायत बढ़ी है.  अब इस बात पर सबकी नजर है कि आगे क्या होने वाला है.

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