केजरीवाल के रास्ते चल 100 करोड़ बचा सकता है बिहार

बिहार के साढ़े तीन हजार वीआईपी की सुरक्षा पर 142 करोड़ रुपये सालाना खर्च है, ऐसे में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल ने सुरक्षा और लाल बत्ती से इनकार कर दिया है तो क्या बिहार उस रास्ते पर चलेगा?

साभार जागरण

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एसए शाद

ऐसे समय में जब कि दिल्ली में राजनीति की उच्च नैतिकता के लिटमस टेस्ट का सही रंग मिल गया है, बिहार में सुरक्षा के मद्देनजर अतिविशिष्ट (वीआइपी) कहलाने वाले लोगों के जमावड़े वाली पार्टियों का जनता के कठघरे में आना तय है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने सरकारी बंगला और सुरक्षा दोनों नकार दी। राजनीति की यह बदली शैली, जो आम लोगों के बीच देश भर में एक खास अपील बनी, भारी सुरक्षा, लग्जरी गाड़ियों के काफिले और भव्य बंगलों में रहने वाले नेताओं की पार्टियों के लिए चुनौती बनने ही वाली है।

खासकर वीआइपी सुरक्षा को लेकर। सूबे में 9,531 ऐसे वीआइपी हैं, जिन्हें पुलिस सुरक्षा प्राप्त है। यह आंकड़ा किसी भी अन्य राज्य से बहुत अधिक है। तय है कि दिल्ली के बाद ऐसे मामले आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को बिहार में भी उठाने हैं। यह इसलिए भी कि अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही घोषणा कर दी थी कि वह न तो कोई सुरक्षा लेंगे और न ही बड़े बंगले में रहेंगे। उन्होंने ऐसा ही किया।

शनिवार को शपथ लेने के लिए मेट्रो ट्रेन से बिना किसी सुरक्षा गार्ड के रामलीला मैदान की ओर निकले। देखा जाए तो बिहार जैसे गरीब राज्य में कहानी कुछ और ही है। यहां किसी भी अन्य राज्य से कहीं अधिक 3,591 ऐसे वीआइपी हैं, जिनकी सुरक्षा पर हर साल राज्य सरकार को 141.95 करोड़ रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

मुख्यमंत्री की बात तो अलग है, लेकिन मंत्रियों के पास भी 18-18 सुरक्षा कर्मी हैं, जबकि हर विधायक को तीन-तीन गार्ड मुहैया कराए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार द्वारा दायर शपथ पत्र के मुताबिक, जिन 3,591 वीआइपी को सुरक्षा मुहैया कराई गई है, उनमें से 70 व्यक्तियों के ऊपर गंभीर आपराधिक आरोप हैं। वीआइपी की सूची में सिर्फ विधायक या पूर्व विधायक ही नहीं हैं, बल्कि कुछ बड़े व्यापारी भी शामिल हैं। सूची में 382 ऐसे भी व्यक्ति हैं जिनका किसी राजनीतिक दल से ताल्लुक नहीं है।1 ‘वीआइपी कल्चर’ की यह स्थिति तब है जब पुलिस और आबादी के राष्ट्रीय अनुपात 1:761 के मुकाबले सूबे में पुलिस-पब्लिक का रेशियो 1:1,456 है।

आबादी के अनुरूप पुलिस कर्मियों की उपलब्धता नहीं रहने का दंश ङोलने के बावजूद बिहार में 10,000 पुलिस कर्मी वीआइपी सुरक्षा में लगाए गए हैं। जबकि करीब साढ़े दस करोड़ की आबादी के लिए यहां पुलिस कर्मियों की संख्या मात्र 87,000 है। 1 प्रदेश में तो अनेक ने नक्सलियों से खतरा बताते हुए भी वीआइपी सुरक्षा ले रखी है। लेकिन, बिहार से कहीं अधिक नक्सल प्रभावित आंध्र प्रदेश से तुलना करें तो वहां इस समय मात्र 847 व्यक्तियों को ही वीआइपी सुरक्षा प्रदान की जा रही है, और इस पर सिर्फ 8.9 करोड़ की ही राशि सालाना खर्च की जाती है। वहीं कर्नाटक में 56.25 करोड़ के सालाना खर्च से 1586 लोगों को वीआइपी सिक्यूरिटी उपलब्ध कराई जा रही है। सबसे कम ‘वीआइपी’ केरल में हैं, जहां मात्र 33 ही ऐसे व्यक्ति चिह्न्ति हैं जो वीआइपी सुरक्षा के घेरे में रहते हैं। इनकी सुरक्षा में मात्र 55 पुलिस कर्मी लगे हैं।

ब्यूरो आफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट(बीपीआरडी) के आंकड़ों के मुताबिक, देश भर में 14,842 को वीआइपी सुरक्षा प्रदान की गई है जिनकी सुरक्षा में 47,557 सुरक्षा कर्मी लगाए गए हैं।

दैनिक जागरण से साभार

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