क्या यह दलितों की बसपाई राजनीति का अंत है या बची हैं कुछ उम्मीदें?

2014 और 2017 में लगातार बुरी तरह पराजय झेल चुकी बहुजन समाज पार्टी की दलित राजनीति का क्या यह अंत है? क्या आने वाले दिनों में दलित राजनीति का चेहरा मायवती के अलावा कोई और होगा? ये दो प्रश्न चुनाव नतीजों के बाद चर्चा में हैं.mayawati

इर्शादुल हक, एडिटर नौकरशाही डॉट कॉम

 

क्षेत्रीय राजनीतिक दलों के बारे में अकसर यह चिंता व्यक्त की जाती है कि वे व्यक्ति आधारित होती हैं इसलिए पार्टी में जेनेरशनल शिफ्ट एक बड़ी चुनौती होती है. हालांकि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम यादव ने, बेटे अखिलेश को सामने ला कर इस जेनेरशनल चेंज को आगे बढ़ाया. इसी तरह रालोद में चरण सिंह के बाद अजित सिंह और अब अजित सिंह के बाद उनके बेटे पार्टी का कमान संभाल रहे हैं. इसी तरह बिहार में लालू प्रसाद ने अगली पीढ़ी को आगे बढ़ाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है. लेकिन जिन क्षेत्रीय पार्टियों में नयी पीढ़ी के रूप में  परिवार का कोई सदस्य नहीं है तो वहां ताकतवर लीडरशिप के उभार के लिए कई चुनौतियां आ सकती हैं. हालांकि इस मामले में परिवारवाद के मुद्दे पर अलग से बहस की जरूरत है.

ऐसे में बहुजन समाज पार्टी ने लगभग तीन दशक का सफर पूरा कर लिया है. कांशी राम ने काफी पहले ही मायावती को नेतृत्व के स्तर पर आगे बढ़ा दिया था. अब मायावती 61 वर्ष की हो चुकी हैं. अगले चुनावों तक 64 वर्ष की हो जायेंगी. लेकिन उनकी पार्टी से अब तक कोई नया चेहरा सामने नहीं आया है. यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब बसपा का लोकसभा में प्रतिनिधित्व जीरो है. विधानसभा में वह 19 पर सिमट चुकी है.

मायावती बसपा की एक मात्र चेहरा हैं. उन्होंने एक तरह से घोषित या अघोषित तौर पर अन्य नेताओं को मीडिया के लिए बैन कर रखा है. और खुद मायावती कभी मीडिया के लिए आसानी से उपलब्ध नहीं रहीं. और ऐसे समय में जब उनकी पार्टी हाशिये पर आ चुकी है तो उनके लिए नयी पीढ़ी को आगे करना एक बड़ी चुनौती है.

किसी जमाने में मायावती के राजनीतिक उभार को तत्कालीन प्रधान मंत्री पीवी नरसंहि राव ने ‘लोकतंत्र का जादू’ कहा था, अब यह जादू फीका पड़ गया है. उधर दलित राजनीति के नये दावेदार पिछले दस वर्षों से इस कोशिश में हैं कि मायावती को कमजोर कर एक नयी दलित राजनीति का विकल्प खड़ा किया जाये. ऐसे में आने वाले दिनों में मायावती के लिए काफी कठिन घड़ी है.

हालांकि ऐसा नहीं है कि मायावती के लिए सारे विकल्प बंद हो चुके हैं. चूंकि बसपा के साथ, सपा भी हाशिये पर चली गयी है, ऐसे में इन दोनों पार्टियों के लिए यह रास्ता भी है कि वे दोनों मजबूत गठबंधन के रूप में नये फार्मुला के साथ सामने आयें. सपा के पास 47 और बसपा के पास 19 विधायकों की संयुक्त ताक से पहला काम तो यह किया जा सकता है कि दोनों पार्टियों से एक एक उम्मीदवार राज्यसभा में भेजा जाये.  अगर सपा-बसपा और कांग्रेस एक साथ मिल कर 2019 के चुनाव की तैयारी करें तो उनकी उम्मीदें प्रबल हो सकती हैं. इसी क्रम में मायवती के लिय यह भी अवसर मिलेगा कि वह अपनी पार्टी से योग्य और युवा चेहरा को सामने लायें ताकि बसपा की जमीन बनी रहे.

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