सारा देश जश्न ए आजादी में डूबा है और बिहार विधानमंडल में झंडा लहरा रहा है पर विधान मंडल के मुख्य द्वार पर इन शहीदों की मूर्तियों पर टंगी सूखी माला हमारे एहसान फरामोशी को दर्शा रही है.

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9 अगस्त से पड़ी है सूखी माला

ये सात शहीद हैं. सातों के चेहरे बिहार विधान मंडल की ओर हैं. सभी आगे बढ़ रहे हैं. इसी तरह तिरंगे की शान में आगे बढ़ते हुए तिरंगे की शान में ये शहीद हुए थे. 11 अगस्त का दिन था वो. गांधी जी ने भारत छोड़ों आंदोलन का बिगुल 9 अगस्त 1942 को फूंका था और उसके ठीक दो दिन बाद बिहार के सात जांबांज शहीद हो गए थे.

उसी याद में उनकी मूर्ति हैं. सप्त मूर्ति.यानी सात शहीदों का स्मारक. लेकिन हद है, न तो बिहार विधान परिषद् यानी उच्च सदन के सभापति अवधेश नारायण सिंह को और न ही बिहार विधान सभा यानी निम्म सदन के अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी को फुर्सत है कि वे इन शहीदों को माला पहनाते. कई दिनों पूर्व डाली माले अब सूख चुकी है. जैसे सूख चुकी है बिहार की राजनीति की संवेदना. सभापति और अध्यक्ष महोदय तो इस बात से ही खुश हैं कि उन्होंने झंडोत्तोलन किया और जन-गन-मन भी गा लिया. मुख्यमंत्री जी को भी इस का संतोष होगा कि उन्होंने गांधी मैदान में झंडोत्तोलन की परंपरा निभाई और परेड की सलामी भी ली.

इन सात शहीदों पर आखिर किसी की नजर क्यों नहीं गई. सोचिए. सोचिए बिहार विधान मंडल गेट के पास उनकी मूर्ति लगाने के मायने. भारत छोड़ो आंदोलन दिवस के मौके पर कांग्रेस ने इन शहीदों को माला पहनायी. यही सूखी माला इन शहीदों की मूर्तियों पर लटक रही है.

By Editor


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