खाकी की खलनायकी

ये हैं आईपीएस जे रवींद्र गौड.लखनऊ के इस पुलिस कप्तान के नेतृत्व में बेलगाम पुलिस बदनामी के रिकार्ड तोड़ रही है.इनके नेतृत्व क्षमता पर सवाल खेड़े करती सुरिंदर पाल सिंह की रिपोर्ट.

एसएसपी रवींद्र गौड  के खिलाफ फर्जी एनकाउंटर का मुकदमा भी चल रहा है

एसएसपी रवींद्र गौड के खिलाफ फर्जी एनकाउंटर का मुकदमा भी चल रहा है

सूबे की सपा सरकार जहां एक तरफ प्रदेश में दिन पर दिन बढ़ रही आपराधिक घटनाओं पर चिंता व्यक्त कर इन पर अंकुश लगाने का दावा करती है वहीं प्रदेश के युवा मुख्यमंत्री खुद सूबे की राजधानी पुलिस की कमान एक ऐसे आईपीएस अफसर के हाथ सौंप देते हैं जो खुद फर्जी एनकाउण्टर की सीबीआई जांच के चपेट में हैं.

2005 बैच के आईपीएस अफसर जे. रविन्द्र गौड को अपराधों पर अंकुश लगाने के जिस सपने के साथ मुख्यमंत्री ने इन्हें राजधानी के एसएसपी का पद सौंपा था यह जनाब खरा नहीं उतर पा रहे हैं. इनके कार्यकाल में अपराधियों की तो छोडि़ए खुद खाकी वर्दी वाले ही बेलगाम हो गए हैं.

दोहरे और तिहरे हत्याकाण्ड के बाद हसनगंज कोतवाली में हुई घटना से अपने दामन में लगे दागों को और गाढ़ा होने और जिले की पुलिस के प्रमुख के पद पर बरकरार रहने के लिए इस आईपीएस अफसर ने कई पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर और कइयों के तबादले कर दिए.

पर सवाल यह है कि कहीं न कहीं जिले की बिगड़ती कानून व्यवस्था के जिम्मेवार इस अफसर पर आखिर सरकार क्यों इतनी नरम है ?

हिरासत में भी मौत

इस अफसर के महज दो महीने के कार्यकाल में लगभग डेढ़ दर्जन से अधिक हत्याएं हो चुकीं हैं.आलम यह है कि हत्या, लूट, बलात्कार जैसी वारदातों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा.
हसनगंज कोतवाली के कारागार में उस रात संदेह जनक हालातों में हुई छब्बीस साल के वीरन्द्र मिश्रा की मौत के बाद इनकी छवि और भी धूमिल हो गई.इन्होंने अपने दामन को और दागदार होने से बचाने के लिए कोतवाल सहित छह लोगों को निलम्बित करने के बाद भले ही उनके खिलाफ हत्या समेत कई धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया पर सवाल यह है कि अगर वीरेन्द्र की मौत का कारण सच में पुलिस की प्रताड़ना बनी तो उस वक्त यह अफसर कहां थे जब वीरेन्द्र को प्रताडि़त किया जा रहा था ?

यह इकलौती घटना नहीं है जिसके बाद खाकी पर से लोगों का भरोसा उठा बीते दिनों बहुत सी ऐसी घटनाएं सामने आईं जिनमें पुलिस की प्रताड़ना के कारण लोगों की मौत होने की बात उजागर हुई. यह मामले इस अधिकारी तक भी पहुंचे. इसके बाद भी ऐसी घटनाओं पर लगाम नहीं लग सका. अब इस अधिकारी के दिशा-निर्देशों में कोई कमी रह गई या फिर इनके दिशा-निर्देश इनके मातहतों के लिए रत्ती भर मायने नहीं रखते ? यह एक बड़ा सवाल है.

पर इससे भी अहम् सवाल यह है कि जिले की पुलिस का प्रमुख होने के बावजूद जो अफसर अपने मातहतों के पेंच नहीं कस सकता वह आखिर अपराध व अपराधियों पर अंकुश कैसे लगा सकेगा ? क्या मातहतों की गलतियों पर महज उन्हें निलम्बित करने से जिले की बिगड़ रही कानून-व्यवस्था संभल सकेगी ?

फर्जी एंकाउंटर मामले में भी फंसे हैं एसएसपी साहब

बात है वर्ष 2007 के जुलाई महीने की 30 तारीख की है. राजधानी के एसएसपी जे. रविन्द्र गौड उस समय बरेली में अपर पुलिस अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे. बरेली के फतेहगंज इलाके में इस दिन एक घटना हुई जिसमें पुलिस ने दावा किया था कि टाटा सूमो में सवार होकर बैंक में लूट की वारदात अंजाम देने जा रहे बदमाशों को जब वह पकड़ने के लिए गए तो बदमाशों ने उन पर गोलियां चला दीं. जवाबी फायरिंग में पुलिस ने मुकुल नाम के युवक के मारे जाने का दावा किया.इसके अलावा पुलिस ने मुकुल के साथी पंकज और विक्की शर्मा की गिरफ्तारी दिखाते हुए एक युवक के फरार होने का दावा किया.

पुलिस ने उनके पास से हथायर होने का भी दावा किया. रविन्द्र गौड की शिकायत पर इनके खिलाफ हत्या का प्रयास करने का मुकदमा दर्ज किया गया. इस मामले में तब एक नया मोड़ आ गया जब मुकुल के पिता बृजेन्द्र कुमार गुप्ता ने इसे फर्जी एनकाउण्टर बताते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मामले की जांच सीबीआई को सौंप दी. सीबीआई ने जांच के दौरान इस मामले में 12 पुलिसकर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया. इन 12 पुलिसकर्मियों में जे. रविन्द्र गौड भी शामिल थे.

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