चाय पुलिस… चाय पुलिस

मैंने अपने घर पर कुछ रिटार्ड पुलिस अधिकारियों को चाय पर क्या बुला लिया, पुलिस के व्यवहार पर बहस ही चल पड़ी. सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों की आंखों से उस तंत्र को आप भी देखें.

अनिता गौतम-यूं तो देश की पुलिस आम जन के बीच काम करने के तरीके को लेकर हमेशा संदेह के घेरे में रहती है, बात चाहे दामिनी सामूहिक दुष्कर्म की घिनौनी घटना के बाद पुलिस पर लगाये गये आरोपों की हो या फिर खुद इस तरह के संगीन अपराधों में लिप्त पुलिस की. बिहार में 10 करोड़ की रकम की डिमांड ने एक बार फिर आला अधिकारियों के होश उड़ा दिये. अभी यह मामला ठंढा भी नहीं हुआ कि एक और अधिकारी पर एक व्यवसायी को बेरहमी से पीट कर अधमरा करने का आरोप लगा.

सेवानिवृत्त डीएसपी 1-सोचना होगा कि पुलिस प्रशासन की विफलता महज कुछ अधिकारियों का निकम्मापन होता है या पूरी व्यवस्था ही इसके लिये जिम्मेदारर है. यदि व्यवस्था की बात है तो उसमें किन बदलावों की जरूरत है. किस आधार पर हमारी पुलिस प्रजातांत्रिक समाज के लिए काम करना सीख सकती है, ताकि आने वाले समय को बेहतर बनाने की एक पहल की जा सके.

सेवानिवृत्त डीएसपी 2- दरअसल हमने अंग्रेजों के संविधान को बिना बारीकी से परखे और उनके दूरगामी असर को समझे बगैर उसे जस का तस उतार लिया. इन्हीं में न्यायिक व्यवस्था के साथ पुलिस और सेना दोनों की कार्यप्रणाली को भी अमूमन ज्यों का त्यों अपना लिया गया. जबकि यह गुलाम भारत की व्यवस्था थी और इसे अंग्रेजों ने भारत पर औपनिवेशिक हुकूमत चलाने के लिए बनाया था. तब गुलाम देश पर कानून और हुकूमत को कुछ इस तरह से इस्तेमाल करना था ताकि कोई विरोध का स्वर न उठे, जबकि आज हम समाज की रक्षा करना है.

दोनों पूर्व पुलिस अधिकारी एक स्वर में– दुर्भाग्य है कि हम आज भी उसी प्रणाली को ढोए जा रहे हैं. फिर किसी भी तरह से पुलिस से दोस्ताना व्यवहार और सहयोग की उम्मीद बेमानी है, जब तक कि इस अंग्रेजी विरासत की व्यवस्था में पूरी तरह पारंगत देश की पुलिस को प्रजातांत्रिक आदर्शों को समझने के योग्य न बनाया जाये.

अनिता गौतम– यह तो बड़ी गंभीर बात आप लोग कह रहे हैं..

सेवानिवृत्त डीएसपी 1– हां.. बिल्कुल यही तो सच्चाई है. इसके लिये हमें पुराने सिस्टम को खतम करना होगा. सिर्फ कहने और नारों के साथ फ्रेंडली पुलिस नहीं हो सकती जब तक कि उनमें आदर्श, आजादी और समानता का समावेश न किया जाये. और इसके लिये कुछ खास बातों पर बारीकी से अध्ययन कर शोध के साथ मानवीयता पर आधारित पुलिस का फिर से गठन करना होगा.

सेवानिवृत्त डीएसपी2-सबसे पहली जरूरत इस बात की है कि पुलिस को यह समझ आये कि वह सिर्फ और सिर्फ देश की जनता के हित के लिये बनी है. हर नागरिक के भी मन में यह विश्वास होना चाहिए कि उसकी जरूरतों के लिये ही देश की पुलिस है. लगभग सभी विकसित प्रजातांत्रिक देशों की पुलिस-व्यवस्था की आधारशिला ऐसी ही होती है और इसकी पहचान आम नागरिकों के बीच पुलिस व्यवस्था कम इमरजेंसी सेवा के रूप में ज्यादा है.

आज पुलिस अपराधियों के पीछे भागने वाली मानी जाती है. जैसा उसके लिए अच्छे लोगों के लिए कोई जरूरत ही न हो.इसे वृद्ध नागरिकों, लाचार बीमार, अपाहिज और खासकर महिलाओं के लिये भी सहज बनाने की आवश्यकता है.

अनिता गौतम- बिल्कुल.. एक दम ऐसा ही होना चाहिए….

डीएसपी1– हर मामले में पुलिस का प्रयास शिकायतकर्ता की संतुष्टि और सही कानूनी प्रक्रिया के अमल पर ही होना चाहिए.पुलिस व्यवस्था का उद्देश्य होना चाहिए कि खास स्थितियों में बिना एफ आइ आर के भी आपसी समझौते, चेतावनी या अच्छे व्यवहार के लिए उत्साहित कर लोगों की समस्याओं का निदान करे.

डीएसपी2- कानून का राज बने इसके लिए न्यायिक प्रक्रिया की जटिलता को भी समझना होगा और पुलिस की कार्यवाही में सबसे बड़ी बाधा बनती है संदेह के लाभ से अपराधियों का बेदाग छूटना और इसी के बिनाह पर प्राय: पुलिस अपने गवाह और गवाही के तरीके को लेकर भी कठघरे में खड़ी दिखती है.

बहरहाल किसी भी तरीके से पुलिस को फ्रेंडली बनाने का पुराना तरीका सिर्फ और सिर्फ एक कल्पना हो सकती क्योंकि पुलिस को मिली असीमित अधिकार और नगण्य कर्तव्य उनमें बदलाव की सबसे बड़ी बाधा हैं.

नोट चूंकि उन पूर्व अधिकारियों से यह बात बिल्कुल अनौपचारिक थी. इसलिए हमने उनका नाम नहीं जाहिर किया है

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