चौटालों को सज़ा:जीत ही गई ईमानदारी

जेबीटी भर्ती केस में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओम प्रकाश चौटाला और अजय चौटाला को 10-10 साल की सजा हो ही गई.इसने साबित किया है कि अगर तंत्र में ईमानदार अधिकारी हों तो भ्रष्चार करने वाला कोई भी हो बच नहीं सकता.

अब चौटाला बंधु के लिए जेल की दीवारें ही असल जगह होंगी. हो सकता है कि वह ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटायें पर आज के अदालती फैसले ने साबित किया है कि हमारे तंत्र में अगर कुछ लोग ईमानदार हों और अपना काम हौसला से करें तो भ्रष्टाचार को मुहकी खानी ही पड़ेगी.

रजनी ने दिखाई ईमानदारी की राह

इस पूरी मामले में आईएएस रजनी शेखरी सिबल जो उस समय प्राथमिक शिक्षा विभाग की निदेशक थीं, की ईमादारी के कारण आज चौटाला बंधुओं को यह दिन देखना पड़ा है.

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सन 2000 में जब चौटाला मुख्यमंत्री बने थे तभी जूनियर बेसिक ट्रेनिंग टीचर( जेबीटी) की परीक्षा के बाद 3200 शिक्षकों की नियुक्ति हुई थी.सिबल तब प्राथमिक शिक्षा विभाग की निदेशक थीं.

सीबीआई की रिपोर्ट के अनुसार हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री के राजनीतीक सलाहकार शेर सिंह बदशामी ने जनवरी 2000 में सिबल से कहा था कि वह रिज्लट की सूची को उनकी इछ्छा के अनूरूप बदल दें.इसके जवाब में 1986 बैच की आईएएस सिबल ने ऐसा करने से साफ मना कर दिया था.

समझा जाता है कि उसी वक्त बदशामी ने उन्हें यह भी धमकी दी थी कि अब वह एक पल के लिए भी प्राथमिक शिक्षा के निदेशक के पद पर नहीं रह सकतीं. जब सिल को यह आभास हो गया कि अब उन्हें ट्रांस्फर कर दिया जायेगा तो उन्होंने बड़ी दूदर्शिता दिखाते हुए तत्क्षण वास्तविक रिजल्ट की सूची को एक लाल कपड़े में बंद करके, अलमीरा को मुहरबंद करके सील करि दिया था.इतना ही नहीं अलमीरा की चाबियों को भी सील करके उस पर वहां मौजूद अधिकारियों-कर्मचारियों के दस्तखत ले लिए थे.

ऐसे दौर में जब आम तौर पर नौकरशाह राजनीतिक नेतृत्व के साथ कदम ताल करके भ्रष्टाचार के सागर में डूबे होते हैं, रजनी शेखरी सिबल ने एक मिसाल कायम की है जिससे यह साबित हुआ है कि ईमानदारी की राह कठिन जरूर होती है पर ईमानदारी का फल तो मिलता ही है.

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