छपरा के धर्मसती की सत्य कथा

अनूप नारायण सिंह ने छपरा के धर्मसती गांव में बीती आधी रात को घूमते हुए घरों का जायाजा लिया है जहां मिड-डे मील खाकर बच्चों ने जान दे दी. पढ़िए दिल को दहलानी वाली यह कथा

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धर्मंसती की वक्ती तस्वीर बेहद भयावह है.इस गांव के कमासुत, जो पंजाब हरियाणा दिल्ली मे रोजी रोटी का जुगाड़ करने गये थे, आब वापस आ चुके है.

मौत का हिसाब मांग रहे हैं कब्र में पड़े मासूम<

मौत के मातम के बीच सरकार द्वारा घोषित अनुदान की चर्चा छिड़ते ही वे लोग गुस्से और आक्रोश मे आ जाते हैं. ग्रामीणों मे सबसे जादा आक्रोश मुख्यमंत्री के नही आने को लेकर है. लोग कहते हैं कि इतनी बड़ी घटना हो गई और साहब हमारे आंसू पोछने नहीं आये.

वे आते तो दिल को सुकून मिलता. वोट की राजनीती में मासुमों की मौत को वो भूलने को तयार नहीं. नेताओं पर और स्थानीय सरकारी अधिकारियों पर उन्हें भरोसा नहीं.

शिक्षा पदधिकारी लेते थे स्कूलों से टैक्स

मशरख प्रखंड में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी के परभार में डीपीओ थे.हाल तक स्थानीय मफ़ियाऒं के डर से वे किसी विद्यालय में नहीं जाते थे. उससे पहले कोई प्रबोध कुमार थे. उन्होंने सभी स्कूलों पर टैक्स बांध रखा था. सिकायत हुई तो बर्खास्त हुए.

इस पूरी वयवस्था के खिलाफ मैंने खुद बिगुल फूका था. दो वर्ष पहले मुख्यमंत्री शिक्षा मंत्री को आवेदन दे कर मिड डे मील पर सवाल उठाया था. करवाई के नाम पर कई सरकारी चिठियां पटना व छपरा मशरख तक चकर काटती रहीं.

स्थनीय सांसद जो उस समय थे, उमाशंकर बाबू जो रिश्ते मे मेरे फूफा लगते हैं, उन्होंने भी सम्बंधित विभाग को पत्र लिखा था. अगर उस पर करवाई हुई होती तो यह घटना नहीं होती.

धर्मसती की घटना के बाद आरोप प्रत्यारोप पर भी गांव के ग्रामीण खामोश हैं. मीना कुमारी के बारे मे पता चला कि वह नाम मात्र की प्रभारी थीं. पूरा खेल तो उसका पति देखता था. उसकी दबंगई के चलते कोई भी आवाज़ नहीं उठती थी.

हम रात मे एक ऐसे घर में पहुचे. जहां घर का एकलौता चिराग बुझ गया है. उस बचे की माँ को बेहोशी की दावा दे कर बेहोश किया जा रहा था. पूछने पर पता चला कि अपना मानसिक संतुलन खो चुकी हैं. उसका पति लुधियाना में मजदूरी करता था घर लौटा तब तक एकलौता बेटा मिट्टी मे समा चुका था.

वह कहता है कि पैसा से क्या उसका बेटा वापस आ जायेगा. वव भोजपूरी में कहता है “जाइं हमरा मुआवजा ना चाही. हमरा बाबू के वापस ला दी लोग. हम कैसै जियाब बाबू के बिना जिनगी कैसी काटी”
उसके सवालों से हमरी आंखें भी भर आईं.

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