छवि सुधारने का छद्मयुद्ध

अपने पिता मुलायम सिंह की पसंद डीजीपी एसी शर्मा को अचानक हटा कर अखिलेश यादव अपनी सरकार की छवि सुधारना चाहते हैं, पर क्या यह इतना आसान है?

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

उत्तर प्रदेश की अखिलेश यादव सरकार पिछले तीन महीने में जितने नौकरशाहों का तबादला कर चुकी है उतने तबादले सभी हिंदी प्रदेशों को एक साथ मिला कर भी नहीं हुए हैं.शुक्रवार को अखिलेश ने पुलिस महानिदेशक एसी शर्मा को अचानक हटा दिया, जो उनके पिता मुलायम सिंह यादव के विश्वासपात्र नौकरशाहों में से एक हैं.akhilesh-yadav

उनकी जगह देव राज नागर को लाया गया है.

शर्मा को इस पद पर अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने के तत्काल बाद मार्च 2012 में लाया गया था.

अखिलेश के इस कदम से एक मैसेज जो राजनीतिक गलियारे में गया है वह यह है कि कानून व्यवस्था पर नाकामी के लगातार लगते आरोपों के बाद अखिलेश ने खुद ही कठिन फैसला लिया है.

विपक्ष के निशाने पर

अखिलेश विपक्षी पार्टियों के निशाने पर रहे हैं. उन पर लगातार आरोप लगते रहे हैं कि वह एक कमजोर मुख्यमंत्री हैं और उनकी सरकार में सत्ता के अनेक केंद्र हैं. पिछले एक साल में आधा दर्जन साम्प्रदायिक दंगे और मार्च के प्रथम सप्ताह में कुंडा के डीएसपी जियाउल हक की निर्मम हत्या के बाद सरकार पर विपक्षी हमले और तेज हो गये थे. डीजीपी एसी शर्मा की भी इन सभी मामलों में काफी किरकिरी हुई. कुंडा में नागरिकों की नाराजगी का यह आलम था कि जब वह शहीद डीएसपी के परिवार वालों से मिलने पहुंचे तो उन्हें धक्कामुक्की का भी सामना करना पड़ा.

इसमें कोई शक नहीं की एसी शर्मा बतौर डीजीपी नाकाम साबित हुए हैं. पिछले दिनों बुलंदशहर में बलात्कार पीड़ित एक नाबालिग दलित लड़की को हिरासत में रखे जाने पर सुप्रीमकोर्ट ने जिस तरह से कॉगनिजेंस लिया, उसके बाद दो महिला कॉंस्टेबुल को निलंबित करना पड़ा. कोर्ट ने इस मामले में राज्य सरकार से रिपोर्ट भी तलब की है.

हालांकि एसी शर्मा को हटाये जाने में अखिलेश ने मुलायम से सहमति ली या नहीं इसका कोई पक्का सबूत नहीं है, पर यह तय है कि अखिलेश ने यह कदम उठाकर यह जताने की कोशिश की है कि वह कड़े प्रशासनिक कदम उठा सकते हैं. वह छवि सुधारने की कोशिश में है और यह मुलायम से उनका छद्मयुद्ध जैसा है. अखिलेश कई तरह की चुनौतियों में घिर चुके हैं.

विफलता

एक साल में सरकार की सबसे बड़ी विफलता कानून व व्यवस्था के मोर्चे पर ही है.खुद सपा के कई विधायकों में एक बैठक में इस तथ्य को उजागर किया है. इतना ही नहीं पिछले तीन महीनों में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने कई बार उनकी प्रशासनिक विफलता पर सीधे उंगली उठाई है. एक बार तो उन्होंने सार्वजनिक मंच पर अखिलेश को यहां तक कह दिया था उन्हें नहीं भूलना चाहिए कि वह राज्य के मुख्यमंत्री हैं न कि समाजवादी पार्टी के. उन्हें नाकारे नौकरशाहों पर अंकुश लगाने की जरूरत है.

अगले साल लोकसभा चुनाव होने हैं, अखिलेश के पास बहुत कम समय है. ऐसे में यह सबसे अहम सवाल है कि क्या वह अपनी धुमिल छवि इतने कम समय में सुधार सकती है?

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