जगजीवन राम शोध संस्थान के भवन का नीतीश ने किया शिलान्यास

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि आजकल राजनीति में विमर्श का स्तर गिरता जा रहा है। कन्टेन्ट गौण होता जा रहा है और व्यक्तिगत चर्चा-आक्षेप ज्यादा हो रही है। विमर्श को स्तरीय बनाने के लिए इतिहास-बोध के साथ-साथ उस विषय में शोध और अध्ययन आवश्यक है।

 

उम्मीद है कि जगजीवन राम संसदीय अध्ययन एवं राजनीतिक शोध संस्थान इस क्षेत्र में उत्कृष्टता एवं गुणवत्ता का एक प्रतिमान स्थापित करेगा। संस्थान के नये भवन के शिलान्यास के बाद संवाद भवन में मुख्यमंत्री सभा को संबोधित कर रहे थे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि संथान का अपना भवन बन जाने के बाद शोधार्थियों के लिए यह एक प्रमुख केेन्द्र बन सकेगा। दुनिया में राजनीतिक फलक पर हो रहे बदलाव पर पैनी नजर और उसका देश-प्रदेश के परिप्रक्ष्य में अध्ययन जरूरी है। जन प्रतिनिधियों को विधायी ज्ञान के साथ-साथ समसामयिक घटनाओं की जानकारी भी एक साथ सरल भाषा उपलब्ध करायी जानी चाहिए। रिसर्च का फायदा नीति निर्माण एवं विश्लेषण में होगा।

करीब छह करोड़ की लागत से बनने वाला यह भवन बनने के बाद संसद भवन की तरह दिखेगा। निर्माण कार्य पन्द्रह महीने में पूरा हो जायेगा। शिक्षा विभाग की इस परियोजना की निर्माण एजेंसी बिहार राज्य शैक्षणिक आधारभूत संरचना विकास निगम लिमिटेड है। इसमें कॉन्फ्रेंस हॉल, रिकॉर्ड रूम, लाईब्रेरी, फेकल्टी रूम और रिसर्च रूम आदि की भी सुविधा होगी।

शिलान्यास समारोह में शिक्षा मंत्री पी0के0 शाही, भवन निर्माण मंत्री दामोदर रावत, शिक्षा विभाग के प्रधान सचिव आर0के0 महाजन, बिहार राज्य शैक्षणिक आधारभूत संरचना विकास निगम लिमिटेड के एमडी संजीवन सिन्हा एवं संस्थान के निदेशक श्रीकांत सहित कई पदाधिकारी एवं गणमान्य अतिथि मौजूद थे।

बातचीत में संस्थान के निदेशक श्रीकांत ने बताया कि शोध और अध्ययन के क्षेत्र में गुणवत्ता एवं उत्कृष्टता के लिए प्रयास किया जा रहा है। ढ़ेर सारी शोध परियोजनाएं पाईप लाईन में है। संसद एवं विधान मंडल की प्रक्रिया एवं कार्य संचालन की सामान्य जानकारी हेतु संस्थान में ओरियेंटेशन कार्यक्रम चलाने की भी योजना है। आगामी विधान सभा में पहली बार चुन कर आने वाले विधायक गण इस कार्यक्रम का लाभ ले सकेंगे। उन्होंने बताया कि संस्थान की शोध पत्रिका ” Democracies ” का  ताजा अंक बिहार चुनाव 2015 पर केन्द्रित है, जो दिल्ली की प्रतिष्ठित संस्था CSDS के निदेशक संजय कुमार और वहां के शोधार्थियों के सहयोग से प्रकाशित किया जा रहा है।

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