जनाक्रोश भी, हुंकार भी पर खबरदार की बात ही कुछ और थी

27 अक्तूबर को हुंकार रैली के अलावा दो और राजनीतिक रैलियां भी हुईं. 25 अक्तूबर को भाकपा की जनाक्रोश रैली और 30 को भाकपा माले की खबरदार रैली.deepankar2

निराला

इन तीन रैलियों राजनीतिक मायने और मकसद में भी सबसे साफ और स्पष्ट संदेश भाकपा माले की रैली का ही रहा. 25 अक्तूबर को भाकपा ने जनाक्रोश रैली में दोहरे नाव पर सवारी करते हुए अपनी बातें स्पष्ट नहीं की. भाकपा भाजपा को तो निशाने पर लेने में लगी रही लेकिन नीतीश कुमार के प्रति पार्टी अपना स्टैंड साफ नहीं कर सकी थी.

भाजपा की हुंकार रैली में नरेंद्र मोदी ने क्या बोला, जाति से लेकर तमाम तरह के पंच-प्रपंच मंच से बतियाये जाते रहे, यह देश भर के लोगों ने देखा-सुना ही. दोनों के उलट भाकपा माले की रैली के मकसद और मायने साफ थे और पार्टी के महासचिव कॉमरेड दीपंकर भट्टाचार्य ने जो कहा, उसके साफ मायने थे कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों से बराबर दूरी बनी रहेगी और दोनों को समर्थन देनेवाले दलों से भी. दीपंकर ने कहा कि लोकसभा चुनाव में व्यक्ति की बजाय नीतियों पर बात होनी चाहिए. माले ने इस रैली में लालू यादव को सहलाते हुए नीतीश और भाजपा पर दूसरे तरीके से भी प्रहार किये.

दीपंकर ने कहा कि चारा घोटाले में लालू को मिली सजा और उनकी रद्द हुई संसद सदस्यता पर रोजाना बात हो रही है लेकिन उसी केस में जदयू के सांसद जगदीश शर्मा की सांसदी भी गयी और भाजपा के नेता धु्रव भगत को भी सजा मिली है, इसे भी बराबर तरीके से बताया जाना चाहिए. दीपंकर ने बाथे-बथानी-मियांपुर का मसला भी जोर शोर से उठाया. पार्टी के रैली स्थल पर बाथे नरसंहार में मारे गये लोगों के नाम और उम्र भी पोस्टर रूप में टांगे गये थे. माले के इस प्रहार से नीतीश कुमार या भाजपा पर कोई असर नहीं पड़नेवाला. भाजपा-जदयू के नेता यह मानकर चलते हैं कि फिलहाल माले एक ऐसी पार्टी है, जिसके एक अदद विधायक तक बिहार में नहीं बचे हैं, इसलिए उसके विरोध से कुछ राजनीतिक नुकसान नहीं होनेवाला. भाजपा-जदयू के नेता सीधे सत्ता की राजनीति करते हैं इसलिए भाकपा माले की सभा या रैली चाहे जितनी बड़ी हो, उन्हें परेशान नहीं करेगी लेकिन इस बार के चुनाव में शायद थोड़ा सोचने को मजबूर तो करेगी ही.

भाकपा माले वैसी पार्टी है, जो बिहार में जनता के सवाल पर विधायक विहीन होने के बावजूद सबसे ज्यादा सड़कों पर उतरती है, आयोजन करती है, जन मसलों को उठाती है. भाकपा माले वह पार्टी भी है, जो दोनों प्रमुख वाम दलों भाकपा और माकपा के सहयोग के लिए परेशान नहीं दिखती बल्कि एकला चलो में ज्यादा भरोसा दिखा रही है. भाकपा माले के नेता बता रहे हैं कि इस बार उनकी पार्टी 20 जगहों से चुनाव लड़ेगी. भले भाकपा माले को सीट आये न आये, लेकिन इतना तो तय है कि जिस तरह से इस बार पहली बार बिहार में तीन मजबूत राजनीतिक दल जदयू, भाजपा और राजद की लड़ाई तीन कोने से होनेवाली है, उसमें माले जैसी पार्टियों का महत्व बढ़ेगा. औरंगाबाद, काराकाट, आरा जैसे कई संसदीय सीट ऐसे हैं बिहार में जहां माले जीते या न जीते, दूसरे की जीत को मुश्किल तो कभी भी बना सकती है.

साभार तहलका

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