जब कभी जिक्र ए पासवान होगा

राम विलास पासवान के राजनीतिक जीवन के पांच बड़े विश्वासघात, मौका परस्ती और दस्तावेजी झूठ की परत-दर परत उधेड़ता हमारे सम्पादक इर्शादुल हक का यह लेख सीधे पासवान को संबोधित हैchirag-reena-paswan-bash_019-500x333

आदरणीय राम विलास पासवान जी
यू तो भारत का इतिहास अलग-अलग राजनेताओं को अलग अलग बातों के लिए याद रखेगा, पर जब कभी आप याद किये जायेंगे, आपको पता है कि कैसे ? अगर आपको इतनी फुर्सत नहीं कि आप इस पर कभी सोचें तो आइए हम बताते हैं.

विश्वास घात-एक

आपके राजनीतिक जीवन का एक तगड़ा सिद्धांत है कि आपका कोई राजनीतिक सिद्धांत कभी नहीं रहा, आपके जीवन का सिर्फ एक लक्ष्य रहा- सत्ता. सत्ता चाहे जैसे आये. इसके लिए झूठ, फरेब जैसे तमाम हथकंड़ों का आपने सहारा लिया है.

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भारतीय राजनीति में आप शायद इकलौते नेता हैं जो गठबंधन की राजनीति के हर खेमे में रहे. यह 1989 के वीपी सिंह के नेतृत्व वाले गठबंधन की बात हो, या कांग्रेसी नेतृत्व वाले यूपीए या फिर घोर दक्षिणपंथी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले एनडीए गठबंधन की बात हो. आपने भारतीय इतिहास के इन तीनों गठबंधनों को गले लगाया यानी आपने सत्ता के लिए हर संभावित घाट का पानी पिया है. आप वीपी सिंह के साथ भी मंत्री रहे, अटलबिहार वाजपेयी के साथ भी रहे और मनमोहन सिंह के साथ भी. यह भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य है कि आपने एक गठबंधन से नाता तोड़ कर दूसरे गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए हर झूठे, हर फरेबी बयान का सहारा लिया.

विश्वासघात- दो

सत्ता के लिए विश्वासघात करने की जब कभी भी नजीर दी जायेगी, आपका जिक्र सरे फिहरिस्त होगा. याद कीजिए जब अटल बिहारी वाजपेयी 1999 में केंद्र में सरकार बना रहे थे. तब आपने सत्ता मोह में एक बयान दिया था. तब आपने कहा था कि साम्प्रदायिकता इस देश में कोई इश्यू ही नहीं है. इस देश को स्थाई सरकार, स्वच्छ प्रशासन और विकास की जरूरत है. यह कहते हुए आपने भाजपा गठबंधन का दामन थाम लिया था. आपकी इस बदली वफादारी का अटल बिहारी वाजपेयी ने अच्छा तोहफा भी दिया था.

आप रेलवे और संचार जैसे प्रभावशाली मंत्रालयों के मंत्री तक बन गये थे. चीजें सब कुछ सामान्य रूप से चलती रहीं. लेकिन मंत्रिमंडल का पुनर्गठन हुआ और आपको महत्वहीन मंत्रालय थमा दिया गया. जो आपको खोटी आंखों भी नहीं भाया था. इस बीच 2001 में गुजरात में भीषण दंगे हुए. चूंकि आपकी राजनीतिक अवकात बता दी गयी थी इसलिए आप घोर निराशा और अवसाद में थे. आपने हर हथकंड़े अपनाये कि आपको आकर्षक मंत्रालय मिले, लेकिन आपकी कोई दाल नहीं गली थी.

गुजरात दंगों के महीनों बाद तक आप इस्पात मंत्रालय इस उम्मीद में संभालते रहे कि कहीं आपको आपके मनमाफिक मंत्रालय मिल जाये. पर नहीं मिला. तब जा कर आपने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दिया. यह कहते हुए कि गुजरात में दंगे हुए और भाजपा सरकार ने मुसलमानों का कत्ल होने दिया ऐसे में इस सरकार में नहीं रह सकते. जबकि देश जानता है कि आपने इसलिए इस्तीफा दिया था कि आपको मनमाफिक मंत्रालय नहीं मिला था. सत्ता मोहमें आप रांतोरात सेक्युलर हो गये थे.

विश्वासघात-तीन

2004 में वाजपेयी सरकार का पतन होता है. सत्ता का जुनून आपके सर पर सवार होता है. आप समय को भांपते हैं और कांग्रेस गठबंधन के साथ हो लेते हैं. मंत्री भी बनते हैं. जनता आपकी इस लगातार बदलती वफादारी को माफ करती रहती है, आपके साथ रहती है. जब 2005 में विधानसभा चुनाव होते हैं आप फिर सेक्युलरिज्म का लाबादा ओढ़ लेते हैं. कल तक साम्प्रदायिकता आपके लिए इश्यु इसलिए नहीं रहता कि आप सत्ता के साथ थे. अचानक आप मुस्लिम प्रेम की चादर ओढ़ लेते हैं. और ओसामा बिन लादेन जैसा दिखने वाले एक गुमनाम शख्स को जिसकी दाढ़ी और पगड़ी में आप मुसलमानों की छवि देखते हैं, उसे अपने हेलिकॉप्टर पर बिठा कर गांव-गांव चुनाव प्रचार पर निकल पड़ते हैं.

2005 के विधानसभा चुनाव में आप बहुत मजबूत बनके उभरते हैं. पर किसी दल को बहुमत नहीं मिलती. आप एक भयानक बयान जारी करते हैं जो झूठ, फरेब और छल पर आधारित होता है. आपक कहते हैं कि आपकी पार्टी उसी को समर्थन देगी जब किसी मुस्लिम को मुख्यमंत्री बनाया जाये. आपके इस शातिराना बयान का एक मात्र मकसद यह होता है कि आप खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे. तब आपने लालू को मुख्यमंत्री बनाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि लालू भारतीय राजनीति के भ्रष्टतम नेता हैं, आपने कहा था कि आप अपना अंत कर लेंगे लेकिन लालू को समर्थन नहीं देंगे. नतीजा यह हुआ था कि किसी की सरकार नहीं बनी. लेकिन उपचुनाव हुए तो लोगों ने आपके विश्वासघात को समझा और आपको कमजोर करके आपकी अवकात बता दी.

विश्वासघात-4

आपके छल, आपके विश्वासघात और धूप-छांव की तरह बदलती आपकी राजनीतिक निष्ठा को तब तक बिहार की जनता बखूबी समझ चुकी थी. तब तक 2009 का लोकसभा चुनाव का वक्त आता है. बिहार की जनता आपके आचरण को पहचानते हुए आपके 44 साल के राजनीतिक जीवन को ध्वस्त कर देती है. गिनीज बुक में भारी मतों से जीत का रिकार्ड रखने वाले राम विलास पासवान को धूल चटा दिया जाता है, आपकी परिवारवादी पार्टी शून्य पर क्लीन बोल्ड हो जाती है. फिर 2010 के विधानसबा चुनाव में भी आपकी वही दुर्गति होती है.

लेकिन 2009 में आप अपने घर में बदहवास पड़े होते हैं. क्योंकि आप सत्ता से तो गायब थे ही सांसदी से भी बेदखल कर दिये गये थे. आपका बंगला ध्वस्त हो चुका था. हालत यह थी कि आप को बतौर सासंद मिलने वाले दिल्ली का बंगला भी खाली करके अपना बोरिया बिस्तर बिहार लाने के सिवा कोई विक्लप नहीं बचता है. उस कठिन समय में वही लालू प्रसाद आपका पालनहार बनते हैं जिन्हें आपने भारतीय राजनीति का सबसे भ्रष्ठ और जंगल राज का राजा कह कर संबंधित किया था. लालू अपनी ताकत से आपको राज्य सभा भेजते हैं, आपकी बदहावासी खत्म होती है.

विश्वासघात-5 (पॉलिटकल बारगेनर)

2014 के चुनाव की घड़ी आती है. आप बारगेनिगं का हर हथकंडा शुरू कर देते हैं. रात में आप कांग्रेस से बारगेनिंग करते हैं और दिन में राष्ट्रीय जनता दल से. बीच-बीच में सुशासन बाबू ( नीतीश कुमार) के साथ आंखमिचौनी भी खेलते हैं, इस उम्मीद में कि किसी संभावित गठबंधन में ज्यादा से जायादा लोकसभा टिकट मिल सके. फिर कहीं दाल नहीं गलती तो आप फिर उस दल की गोद में कूद पड़ते हैं जिस पर 12 साल पहले गुजरात नरसंहार का आरोप लगा कर अलग हो गये थे. आप उस दल के साथ हो लेते हैं जिसके नेता नरेंद्र मोदी को पूरे एक युग से खलनायक के तौर पर प्रचारित करते हैं. आप यह भी नहीं सोचते कि आपके सरकारी बंगले की बेदखली को रोकने के लिए और आपकी बदहवासी को खत्म करने के लिए जिस लालू प्रसाद ने आपको राज्यसभा का सांसद बनवाया था उस एहसान को झटके में भूल जाते हैं.

डाक्युमेंट्री झूठ

राम विलास पासवान जी, इतिहास में सिर्फ पॉलिटकल विश्वासघात और सत्ता लोभ के लिए ही आप नहीं जाने जायेंगे बल्कि आप दस्तावेजी झूठ के लिए भी याद किये जायेंगे.

1969 में आप पहली बार अलौली से विधायक बनते हैं. तब आपकी उम्र महज 22 साल 7 महीने और चार दिन की होती है. देश जानता है कि विधायक बनने के लिए न्यूनतम उम्र 25 साल होनी चाहिए. आप बतायें कि इस झूठ का निबटारा अभी तक हुआ क्या?

आप 2004 के लोकसभा चुनाव में 6 अप्रैल को दाखिल शपथ पत्र में वे अपनी उम्र 58 वर्ष बताते हैं. 2 अप्रैल 2009 को दाखिल चुनाव शपथ पत्र में आप अपनी उम्र 61 वर्ष बताते हैं. इसी तरह राज्यसभा चुनाव के लिए 2 जून 2010 को दाखिल शपथ पत्र में 63 दिखाते हैं. यह सारे तथ्य आपके शपथपत्र में आज भी मौजूद हैं.

पासवान जी, 2014 के लोकसभा चुनाव में आपका भविष्य क्या होगा, यह तो समय बतायेगा. पर आप समय निकालिए और कभी अपने राजनीतिक जीवन के बारे में सोचिए और अपनी आत्मा से पूछिए कि इतिहास आपको कैसे याद रखेगा?

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