जब जनता बन आवाज़ उठानी होगी, तो किसकी तरफ़ देखेंगे आप : रविश कुमार

टीवी पत्रकार पुण्‍य प्रसून वाजपेयी के इस्‍तीफे पर वरिष्‍ठ पत्रकार रविश कुमार ने लिखा कि क्या हम ऐसे बुज़दिल इंडिया में रहेंगे जहाँ गिनती के सवाल करने वाले पत्रकार भी बर्दाश्त नहीं किए जा सकते? फिर ये क्या महान लोकतंत्र है? प्रसून को इस्तीफ़ा देना पड़ा है. अभिसार को छुट्टी पर भेजा गया है. आप को एक दर्शक और जनता के रूप में तय करना है. धीरे धीरे आपको सहन करने का अभ्यास कराया जा रहा है. आपमें से जब कभी किसी को जनता बनकर आवाज़ उठानी होगी, तब आप किसकी तरफ़ देखेंगे.

नौकरशाही डेस्‍क

क्या इसी गोदी मीडिया के लिए आप अपनी मेहनत की कमाई का इतना बड़ा हिस्सा हर महीने और हर दिन ख़र्च करना चाहते हैं? क्या आपका पैसा इसी के काम आएगा? आप अपनी आवाज़ ख़त्म करने के लिए इन पर अपना पैसा और वक़्त ख़र्च कर रहे हैं? इतनी लाचारी ठीक नहीं है. आप कहाँ खड़े हैं ये आपको तय करना है. मीडिया के बड़े हिस्से ने आपको कबका छोड़ दिया है.

गोदी मीडिया आपके जनता बने रहने के वजूद पर लगातार प्रहार कर रहा है. बता रहा है कि सत्ता के सामने कोई कुछ नहीं है. आप समझ रहे हैं, ऐसा आपको भ्रम है. दरअसल आप समझ नहीं रहे हैं. आप देख भी नहीं रहे हैं. आप डर से एडजस्ट कर रहे हैं. एक दिन ये हालत हो जाएगी कि आप डर के अलावा सबकुछ भूल जाएँगे. डरे हुए मरे हुए नज़र आएँगे. फेक दीजिए उठा कर अख़बार और बंद कर दीजिए टीवी.

उधर, ट्विटर पर भी इस मामले में लोगों ने मोदी सरकार के खिलाफ जमकर प्रतिक्रिया दी है. अली आसिफ नाम के शख्‍स ने लिखा कि इसे कहते है अघोषित इमरजेंसी, मोदी सरकार डरी, पूण्य प्रसून वाजपेयी का #ABPNews से इस्तीफा लिया. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अब सरकार का गुलाम बन गया है, इस का उदाहरण है. आकाश शर्मा ने कविता के जरिये लिखा –

जिस दौर में अख़बार ओ मीडिया नीलाम है,

प्रसुन,अभिसार,रवीश को अपना सलाम है.

सच कहने नही देता वो जुमलों का शहँशाह,

ग़रीबों को चूसता अमीरों का इक ग़ुलाम है.

जो ख़िलाफ़ बोलेगा काम से हाथ धो लेगा,

हिंदोस्ताँ में तख्तनशीं उफ़ सनकी निज़ाम है.

गौरतलब है कि मीडिया की नाक में नकेल डाले जाने का जो सिलसिला पिछले कुछ सालों से नियोजित रूप से चलता आ रहा है. मीडिया का एक बड़ा वर्ग तो दिल्ली में सत्ता-परिवर्तन होते ही अपने उस ‘हिडेन एजेंडा’ पर उतर आया था, जिसे वह बरसों से भीतर दबाये रखे थे. यह ठीक वैसे ही हुआ, जैसे कि 2014 के सत्तारोहण के तुरन्त बाद गोडसे, ‘घर-वापसी’, ‘लव जिहाद’, ‘गो-रक्षा’ और ऐसे ही तमाम उद्देश्यों वाले गिरोह अपने-अपने दड़बों से खुल कर निकल आये थे और जिन्होंने देश में ऐसा ज़हरीला प्रदूषण फैला दिया है, जो दुनिया के किसी भी प्रदूषण से, चेरनोबिल जैसे प्रदूषण से भी भयानक है. घृणा और फ़ेक न्यूज़ की जो पत्रकारिता इन दिनों देखने को मिली, वैसा 46 सालों में कभी नहीं देखा गया.

 

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