जश्न ए आज़ादी के दिन दलितों पर दरिंदगी

क्या दलित आज भी इस देश के गुलाम है? 15 अगस्त को जब रोहतास के दलितों ने तिरंगा लहाराना चाहा तो दबंगों ने गोलियों से भून दिया. घायलों की जबानी सुनिये उनकी दर्द भरी कहानी.

राहुल:  दबंगों ने जुबान भी छीन ली

राहुल: दबंगों ने जुबान भी छीन ली

प्रणय प्रियंवद

बिहार का एक और पंद्रह अगस्त यादगार हो गया. रोहतास के बड्डी गांव में 15 अगस्त को दबंग बाबूओँ ने तिरंगा फहराने की जिद्द ठान ली और वो भी उस स्थल पर जहां पहले से पुलिस ने मना कर रखा था.

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बड्डी निशान सिंह का गांव है. वही निशान सिंह जो जमींदार रघुवर दयाल सिंह के पुत्र थे और जिन्हें सैन्य संचालन में महारत हासिल थी.

उसी निशान सिंह के गांव में बना नया इतिहास. दबंगों ने कइयों को(3 को) मार गिराया और कई अब भी(20-25) जिंदगी मौत के बीच हैं. रविदास समाज यानी चर्मकार जाति और बाबूओं यानी राजपूतों के बीच यहां संघर्ष हुआ.आखिरकार बाबूओँ ने खूनी धरती पर तिरंगा गाड़ दिया. पीएमसीएच, बनारस और सासाराम के अस्पतालों में दो दर्जन से अधिक दलित कराह रहे हैं.

1857 के सिपाही विद्रोह में निशान सिंह ने सैनिकों का नेतृव किया था उन्होंने. आजमगढ़ किले पर धावा बोल कर उन्होंने अंग्रेजों को हराया था. बाबू कुंवर सिंह के सबसे बडे सहयोगी थे निशान सिंह.
वे निशान सिंह का स्मारक भी उस जमीन पर बनाना चाहते थे.लेकिन दलित तैयार नहीं थे.

पीएमसीएच में पति का इलाज करा रहीं प्यारी देवी कहती हैं—“ ऊ सब चाहत रहे कि निशान के बैठाइम…. हमनी कहनी दुआर पर घर उठावे के चाहब तो उठाबे देही कइनो….थाना कहलस दूनो झंडा न फरहाइब….हमनी मान गइलीं… पर ऊ सब झंडा फहरादेलस… महिला और मरद, लइका सब के मारलस..बंदूक फायर से… थानो साथ रहे.”

तेजा राम बताते हैं कि उनकी कमर तोड़ दी गयी है.वे कहते हैं- “मारले बा राजपूत सब पानी मे हइला इइला के… मंदिर के आगे झंडा फहरावे के का जरूरत रहे. पर मार के जबरदस्ती फहरइलस झंडा.मार के डांढ़ तोड़ देलस बा ”

राहुल

पीएमसीएच में ही भर्ती है राहुल. राहुल की उम्र मुश्किल से 16-17 बरस की होगी. उसके सिर में चोट है. उसकी मां कश्मीरा देवी कहती हैं- “झंडा फहरात रहे… त भइल तोहनी के जगह नहखे हमनी के बा… बस मार के गिरा देलस…. एक घंटा गोली चलइलस..और झंडा फरहा देलस.. ईंटा , पत्थर, लाठी से मारलस.. घर ढ़ाह देलस….किवाड़ी तोड़ के चोरा के ले गेलस…हमार बेटा बोलत रहे लेकिन अब बोलते नहखे… का करीं.( झंडा फहराने की तैयारी चल रही थी. तब उन लोगों ने कहा कि यह उनकी जमीन है हमारी नहीं. बस फिर उन लोगों ने हमे मार गिराया. एक घंटा तक गोली चली हमारा बेटे की जुबान चली गयी है. वह बोल नहीं पा रहा है) .” राहुल बोलना चाहता है लेकिन उसके मुंह से आ…आ…. की आवाज ही निकल रही है. सिर पर गंभीर जख्म ने उसकी आवाज छीन ली आजादी के दिन…..वो कुछ भी अभिव्यक्त कर पाने की स्थिति में नहीं.

मंगरू राम

मंगरू का हाथ टूट गया हैं. वो कहते हैं—- “बाबू साहब सब मार के तोड़ देलस हाथ..” मंगरू के कुर्ते पर खून के कई धब्बे हैं… कुर्ते का रंग लाल हो गया है. मंगरू बहुत बात करने की स्थिति में नहीं हैं. मंगरू के नाती दशरथ राम बताते हैं “लाठी- डंडा से मार भइल.. 40 राउंड गोली चललस. निशान जी के स्मारक बैठावे खातिर और झंडा फहरावे खातिर इस सब भइल… सब बाबू साहब सब मारलस बा”. ( लाठी – डंडे से मारपीट हुई. चालीस राउंड गोली चलायी गयी. वे चाहते थे निशान जी का स्मारक बने और झंडा फहराया जाये. बाबू साहबों ने हमें मारा है.
बड्डी से इलाज के लिए पीएमसीएच आए लोगों में महिला चंपा भी है. चंपा के शरीर में कई जगह गंभार चोट है. उसे उलटने-पटलने में भी दिक्कत हो रही है. उसने बताया कि- “हम भाग गइले रहलीं तभियो घर में घुस के मारलस….छैबर सिंह, विनोद सिंह, शंभू सिंह मारलस.. ऊ कहत रहे कि झंडा फहरा के रहम…. घर से घींच के मारलस … दू घंटा गोली चललस और चार घंटा लाठी बरसल.. हमार पूरा शरीर पर लाठी से मारलस बा”

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