जागरण प्रबंधन व एक नेता की महत्वाकांक्षा के शिकार हुए शैलेंद्र

दैनिक जागरण बिहार के सम्पादक शैलेंद्र दीक्षित रिटायर कर दिये गये. डेढ़ दशक में दीक्षित ने कमाल कर दिया.  यहां पढिये कि वह कैसे जागरण के मालिक और भाजपा नेता की महत्वकांक्षा के शिकार हुए.

इर्शादुल हक, सम्पादक नौकरशाही डॉट इन

शैलेंद्र दीक्षित

शैलेंद्र दीक्षित

लगभग डेढ़ दशक पहले दैनिक जागरण जब पटना से लॉंच हुआ तो पत्रकारिता बिहार की पत्रकारिता में एक नया नाम जुड़ा शैलंद्र दीक्षित का. दीक्षित के सामने न सिर्फ दैनिक जागरण को स्थापित करने की चुनौती थी बल्कि पाठकों के बाजार में लगभग एकाधिकार बना चुके हिंदुस्तान अखबार से टक्कर लेना भी था.

कहते हैं कि अखबार और सिगरेट की लत एक जैसी होती है. एक बार किसी ने एक खास ब्रांड की सिगरेट पीनी शुरू कर दी तो उसे दूसरा ब्रांड शायद ही भाये. ठीक वैसे ही, शैलेंद्र दीक्षित के सामने हिंदुस्तान के लिए एडिक्ट हो चुके पाठकों को जागरण की तरफ मोडने की चुनौती थी. हालांकि इस बात का कोई प्रमाणिक अध्ययन नहीं हुआ है कि दैनिक जागरण ने पटना हिंदुस्तान के कितने पाठकों को अपनी ओर स्थाई रूप से मोड लिया, पर यह तय है कि उसने हिंदुस्तान के समक्ष गंभीर चुनौती पेश की और देखते ही देखते उसने बिाहर में लाखों पाठकों में अपनी जगह बना ली. हां यह अलग बात है कि जागरण ने हिंदुस्तान से ज्यादा दैनिक आज को प्रभावित किया. और इस काम के लिए बतौर टीम लीडर किसी एक पत्रकार की भूमिका रही तो वह नाम शैलेंद्र दीक्षित का है.

दैनिक जागरण का सम्पादक रहते हुए दीक्षित जी से मेरी पहली और आखिरी मुलाकात उनके दफ्तर में तब हुई थी जब हम एक पत्रिका के लिए बिहार के दस महानायकों पर काम कर रहे थे. निराला और मैं उनसे यह आग्रह करने गये थे कि वह उस चयन समिति का हिस्सा बनें जिसे तय करना था कि आजादी के बाद के बिहार के कौन दस महानायक हो सकते हैं. दीक्षित जी बाजाब्ता तौर पर इस समिति में शामिल तो नहीं हुए पर इतना जरूर किया कि उन्होंने हमें कुछ नाम सुझाये.

अब  दीक्षित जी दैनिक जागरण से 23 अगस्त को रिटायर कर दिये गये हैं.

जागरण को स्थापित करने में शैलेंद्र दीक्षित की भूमिका पर कुछ भी कहना कम है. लेकिन इस बात पर चर्चा जरूर होनी चाहिए कि जागरण प्रबंधन ने उनको जिस तरह से अलविदा किया वह यह साबित करने के लिए काफी है कि उसके लाभ-हानि की प्राथमिकता अब बदल चुकी है. नयी प्राथमिकता में शैलेंद्र दीक्षित की भूमिका महत्वपूर्ण नहीं है. कहने को दीक्षित जी की उम्र 59 की हो गयी थी. तकनीकी रूप से उन्हें रिटायर करना था. सो कर दिये गये. पर सच्चाई कुछ और ही थी. जिस दिन दीक्षित रिटायर कर रहे थे उसी दिन प्रशांत मिश्र बिहार-पश्चिम बंगाल के सम्पादक बना दिये गये. प्रशांत भी 59 के हैं और उन्हें जागरण प्रबंधन ने एक्सटेंशन दिया है.  पर दीक्षित को यह लाभ नहीं मिला. वजह यह थी कि प्रबंधन को दीक्षित सोहा नहीं रहे थे. सोहा रहे होते तो उन्हें रिटायर नहीं किया जाता.

बिहार भाजपा के एक नेता का भी हाथ

ऐसे में सवाल उठता है कि दीक्षित को क्यों रिटायर किया गया? अंदरखाने की खबर यह है कि दैनिक जागरण समूह के मालिकों में से एक संजय गुप्ता की राजनीतिक महत्वकांक्षा, भाजपा के सत्ता में आने के बाद काफी बढ़ गयी है. बताने वाले बता रहे हैं कि इसी महत्वकांक्षा के पीछे सारा खेल छुपा है. किस्सा ए मुख्तसर यह है कि आम चुनाव के दौरान बिहार भाजपा के दिग्गजों को शिकायत यह थी कि दीक्षित ने भाजपा के पक्ष में उतनी तत्पर्ता से काम नहीं किया जितनी उन्होंने उम्मीद पाल रखी थी. वैसे पाठकों को पता है कि जागरण समूह का झुकाव भाजपा की तरफ रहा है और खूब रहा है. लेकिन किसी कारणवश भाजपा के एक दिग्गज उनके पीछे पड़े थे. इधर कुछ सूत्र यह बताते हैं कि भाजपा सत्ता में आने के बाद संजय गुप्ता को अब राज्यसभा का सदस्य बनाने पर विचार कर रही है. वह भी उत्तर प्रदेश से नहीं बल्कि बिहार से. ऐसे में भाजपा के उन दिग्गज को यह अच्छा मौका मिला कि संजय गुप्ता को समझा सकें कि वह राज्यसभा के सदस्य बनना चाहते हैं तो उन्हें शैलेंद्र दीक्षित से किनारा करना होगा.

संजय गुप्ता की महत्वकांक्षा

संजय गुप्ता ठेठ कारोबारी हैं. इससे पहले उनके पूर्वज नरेंद्र मोहन भी भाजपा कोटे से राज्यसभा जा चुके हैं. तो जाहिर है कि गुप्ताजी भी इस अवसर को किसी भी तौर गंवाना नहीं चाहते. बस उन्हें करना यह था कि दीक्षित को जितना जल्दी हो सके किनारा करना था. खबर तो यहां तक है कि दीक्षित को संजय गुप्ता ने उनके जन्मदिन से एक रोज पहले ही ईमेल के माध्यम से बधाई दे दी. खैर मौजूदा बाजार व राजनीतिवादी पत्रकारिता में शैलेंद्र दीक्षित जैसी घटना कोई खास बात नहीं है. पर दीक्षित जी ने जिस तरह से नेतृत्व किया वह काबिल ए तारीफ है. हम उनकी अगली पारी की सुखद कामना करते हैं.

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